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'बोल के लब आजाद हैं तेरे', वो गाना जिसने जंतर-मंतर पर Gen-Z की रगों में लाया उबाल

यह गाना 2018 में रिलीज फिल्म 'मंटो' में आया था. फिल्म निर्मात्री नंदिता दास द्वारा निर्देशित इस बायोपिक में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और रसिका दुग्गल मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म में एक दृश्य में यह गाना बहुत प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया था. उस समय यह गाना ज्यादा चर्चा में नहीं आया, लेकिन अब जंतर मंतर के प्रदर्शन ने इसे नई पहचान दी है.

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Edited By: Antima Pal
'बोल के लब आजाद हैं तेरे', वो गाना जिसने जंतर-मंतर पर Gen-Z की रगों में लाया उबाल
Courtesy: X

Bol Ke Lab Azaad Hain: दिल्ली के जंतर मंतर पर 36 दिनों तक चला छात्रों का आंदोलन समाप्त हो गया है, लेकिन इस आंदोलन ने एक आठ साल पुराने गाने को नई जान दे दी है. 'बोल के लब आजाद हैं' अब छात्रों के प्रदर्शन का सबसे लोकप्रिय गीत बन गया है. सोशल मीडिया पर फैली वीडियो और रील्स में यह गाना हर जगह सुनाई दे रहा है.

आखिर इतना पॉपुलर क्यों हुआ यह गाना?

जंतर मंतर पर छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे थे. मार्च, भाषण और एकजुटता के पलों में यह गाना बार-बार बज रहा था. इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर सैकड़ों रील्स में इस गाने का इस्तेमाल हुआ. कई युवा इस गाने को पहली बार सुन रहे थे और तुरंत इससे जुड़ गए. इस तरह एक पुराना गाना नए आंदोलन का आवाज बन गया. 

बना प्रोटेस्ट का एंथम

यह गाना 2018 में रिलीज फिल्म 'मंटो' में आया था. फिल्म निर्मात्री नंदिता दास द्वारा निर्देशित इस बायोपिक में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और रसिका दुग्गल मुख्य भूमिकाओं में थे. फिल्म में एक दृश्य में यह गाना बहुत प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया गया था. उस समय यह गाना ज्यादा चर्चा में नहीं आया, लेकिन अब जंतर मंतर के प्रदर्शन ने इसे नई पहचान दी है.

'बोल के लब आजाद हैं' मूल रूप से प्रसिद्ध उर्दू शायर फैज अहमद फैज की कविता 'बोल' पर आधारित है. 1930 के दशक में लिखी गई यह कविता आज भी प्रासंगिक है. कविता में अपनी आवाज़ को आज़ाद रखने और सत्ता के सामने सच बोलने की हिम्मत की बात की गई है. संगीतकार स्नेहा खानवलकर ने इस कविता को फिल्म के लिए गाने का रूप दिया. गायन में क्लासिकल गायक राशिद खान और विद्या शाह की आवाज़ शामिल है.

आंदोलन के दौरान युवा इस गाने को इसलिए पसंद कर रहे हैं क्योंकि इसमें आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संदेश है. छात्रों का कहना है कि यह गाना उनकी भावनाओं को बयान करता है. जब वे 'बोल कि लब आजाद हैं तेरे...' गाते हैं तो उनमें नई ऊर्जा आ जाती है.

फैज अहमद फैज की कविताएं दशकों से भारत और पाकिस्तान दोनों जगह आंदोलनों में इस्तेमाल होती रही हैं. थिएटर, संगीत और साहित्य में इनका बार-बार इस्तेमाल हुआ है. 'मंटो' के गाने ने अब एक नई पीढ़ी को फैज की कविता से जोड़ा है.

क्यों गूंजता है यह गाना?

इस गाने की खासियत यह है कि इसका संदेश कभी पुराना नहीं पड़ता. आज के समय में जब युवा अपनी बात रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब यह गाना उन्हें साहस देता है। यह याद दिलाता है कि आवाज़ होना ही काफी नहीं, उसे इस्तेमाल करना भी ज़रूरी है. जंतर मंतर का आंदोलन भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन 'बोल के लब आजाद हैं' अब छात्रों के संघर्ष का प्रतीक बन चुका है. सोशल मीडिया के जरिए यह गाना लाखों युवाओं तक पहुंच गया है.