समुद्र की अथाह गहराइयों में छिपे रहस्य अक्सर वैज्ञानिकों को नई कहानियां सुनाते हैं. इस बार हिंद महासागर के तल से ऐसी खोज सामने आई है जिसने दुनिया भर के शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. समुद्री वैज्ञानिकों की एक टीम ने समुद्र के बेहद दुर्गम क्षेत्र में सैकड़ों व्हेल कंकालों का पता लगाया है. यह खोज केवल जीवाश्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री जीवन, प्रजातियों के विकास और करोड़ों वर्षों पुराने पारिस्थितिकी तंत्र को समझने की दिशा में बड़ा संकेत मानी जा रही है.
चीन के उन्नत गहरे समुद्री सबमर्सिबल 'फेंडोउझे' की मदद से वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर के एक कम खोजे गए क्षेत्र में कई बार गोता लगाया. इस अभियान का नेतृत्व समुद्री वैज्ञानिक शियाओतोंग पेंग ने किया. कुल 32 गहरे समुद्री अभियानों के दौरान टीम ने समुद्र तल पर 476 ऐसे स्थान दर्ज किए, जहां व्हेल के जीवाश्म या कंकाल मौजूद थे. यह संख्या वैज्ञानिकों के लिए भी अप्रत्याशित थी. इन अवशेषों ने संकेत दिया कि लाखों वर्षों से यह इलाका समुद्री जीवों के जीवन और मृत्यु का महत्वपूर्ण केंद्र रहा हो सकता है. समुद्र की अंधेरी दुनिया में इतनी बड़ी संख्या में व्हेल अवशेष मिलना एक दुर्लभ घटना माना जा रहा है.
Team of researchers discover large whale graveyard in Indian Ocean — some fossils 5.3 million years old
— RT (@RT_com) June 11, 2026
Jellyfish, worms, and crustaceans now feast on the remains of ancient giants over an area of 1,200 km at a depth of 7 km
The existence of such a necropolis is a mystery pic.twitter.com/Or3pHXvZO9
शोधकर्ताओं के अनुसार कई जीवाश्म लगभग 53 लाख वर्ष पुराने हैं. इन कंकालों ने समुद्री इतिहास की एक लंबी समयरेखा को संरक्षित कर रखा है. अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को पांच ऐसे 'सक्रिय व्हेल फॉल' भी मिले, जहां हाल के समय में मरी व्हेलों के अवशेष अब भी अन्य जीवों के लिए भोजन का स्रोत बने हुए हैं. इससे पता चलता है कि समुद्र की गहराइयों में मृत्यु भी नए जीवन को जन्म देती है. इन अवशेषों के जरिए वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अलग-अलग युगों में व्हेल किस तरह विकसित हुईं और उन्होंने महासागरों में अपना विस्तार कैसे किया.
इस खोज का सबसे रोमांचक पहलू एक नई प्राचीन व्हेल प्रजाति की पहचान है. वैज्ञानिकों ने इसे 'प्टेरोसेटस डायमैन्टिनाए' नाम दिया है. इस प्रजाति के अवशेष काफी अच्छी स्थिति में मिले हैं, जिससे उसके शरीर की संरचना और जीवन शैली को समझने में मदद मिल रही है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह व्हेल उस दौर में समुद्रों में तैरती थी, जब आज के महाद्वीप और तटीय क्षेत्र पूरी तरह अलग स्वरूप में थे. नई प्रजाति की पहचान समुद्री स्तनधारियों के विकासक्रम को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज केवल कंकालों की गिनती भर नहीं है. इन अवशेषों के वितरण और उनसे जुड़े जीवों के अध्ययन से प्राचीन व्हेलों के प्रवास मार्गों, विभिन्न प्रजातियों के आपसी संबंधों और दूर-दूर तक फैले गहरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में नई जानकारियां मिल सकती हैं. व्हेल कंकालों के आसपास हड्डियां खाने वाले कीड़े और अन्य समुद्री जीव भी पाए गए, जो इन अवशेषों पर निर्भर रहते हैं. यह अध्ययन संकेत देता है कि समुद्र का तल उतना सुनसान नहीं है जितना कभी माना जाता था. इसके भीतर जीवन और संबंधों का एक विशाल नेटवर्क मौजूद है, जिसे समझना अभी बाकी है.