कल्पना कीजिए... भारत अभी भी अंग्रेजों का गुलाम है. देश के भीतर ब्रिटिश सरकार का शासन चल रहा है, लेकिन हजारों किलोमीटर दूर एक दूसरे देश में कुछ भारतीय क्रांतिकारी बैठकर यह घोषणा करते हैं कि "भारत की अपनी सरकार बन चुकी है. यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि इतिहास का एक वास्तविक अध्याय है.
अधिकांश लोग मानते हैं कि भारत की पहली निर्वासित (Exile) सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में बनाई थी. लेकिन सच्चाई यह है कि इससे लगभग 28 वर्ष पहले, 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में राजा महेंद्र प्रताप के नेतृत्व में भारत की अस्थायी सरकार (Provisional Government of India) की स्थापना हो चुकी थी.
यह सरकार भारत की धरती पर नहीं बनी थी, लेकिन इसका उद्देश्य स्पष्ट था—ब्रिटिश शासन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देना और दुनिया को यह बताना कि भारत केवल अंग्रेजों का उपनिवेश नहीं, बल्कि स्वतंत्र राष्ट्र बनने का अधिकार रखता है.
1914 में पहला विश्व युद्ध शुरू हो चुका था. ब्रिटेन यूरोप में बड़े युद्ध में उलझा हुआ था. लाखों भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना की ओर से विभिन्न मोर्चों पर लड़ रहे थे. इसी समय विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों ने सोचा कि यदि ब्रिटेन इस युद्ध में कमजोर पड़ता है, तो भारत की आज़ादी का रास्ता खुल सकता है.
लेकिन इसके लिए केवल भारत के भीतर आंदोलन काफी नहीं था. दुनिया को यह दिखाना भी जरूरी था कि भारतीयों की अपनी राजनीतिक नेतृत्व क्षमता है और वे स्वतंत्र सरकार चलाने की योग्यता रखते हैं. यहीं से विदेश में भारतीय सरकार बनाने की योजना आकार लेने लगी.
राजा महेंद्र प्रताप केवल एक रियासत के शासक नहीं थे. वे दूरदर्शी विचारक, शिक्षाविद, समाज सुधारक और क्रांतिकारी भी थे. उत्तर प्रदेश की मुरसान रियासत में जन्मे महेंद्र प्रताप ने आरामदायक जीवन छोड़कर देश की स्वतंत्रता का रास्ता चुना. उनका मानना था कि भारत की लड़ाई केवल देश के भीतर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी लड़ी जानी चाहिए. इसी सोच ने उन्हें भारत से बाहर निकलकर अफगानिस्तान, जर्मनी, तुर्की और अन्य देशों के नेताओं से संपर्क स्थापित करने के लिए प्रेरित किया.
दरअसल, उस समय अफगानिस्तान ब्रिटिश भारत और रूसी साम्राज्य के बीच एक रणनीतिक देश था. ब्रिटेन वहां अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता था, लेकिन अफगानिस्तान पूरी तरह उसके नियंत्रण में नहीं था.
भारतीय क्रांतिकारियों को उम्मीद थी कि यदि अफगानिस्तान और ब्रिटेन के विरोधी देशों का सहयोग मिल जाए, तो उत्तर-पश्चिमी सीमा के रास्ते भारत में अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया जा सकता है. इसी रणनीतिक सोच के कारण काबुल को इस सरकार का मुख्यालय बनाया गया.
1 दिसंबर 1915 को काबुल में भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा की गई. इस सरकार की संरचना भी किसी स्वतंत्र देश की सरकार की तरह थी.
सरकार का उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक नहीं था. इसके सामने स्पष्ट लक्ष्य थे
यह पहली बार था जब विदेश में भारतीयों ने स्वयं को एक स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया.
यहीं इस सरकार की सबसे बड़ी चुनौती सामने आई. राजा महेंद्र प्रताप और उनके साथियों ने जर्मनी, उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य, रूस और अन्य देशों से संपर्क किया. उनका उद्देश्य था कि ब्रिटेन के विरोधी देश भारत की स्वतंत्रता का समर्थन करें. हालांकि कुछ देशों ने सहानुभूति दिखाई, लेकिन किसी बड़ी शक्ति ने इस सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी. प्रथम विश्व युद्ध की बदलती परिस्थितियों ने भी इस योजना को आगे बढ़ने का अवसर नहीं दिया.
यदि केवल परिणाम देखा जाए तो यह सरकार भारत को स्वतंत्र नहीं करा सकी, लेकिन इतिहास केवल अंतिम परिणाम से नहीं लिखा जाता. काबुल की अस्थायी सरकार ने पहली बार यह संदेश दिया कि भारतीय केवल ब्रिटिश शासन का विरोध नहीं कर रहे, बल्कि अपने देश की वैकल्पिक सरकार बनाने की राजनीतिक क्षमता भी रखते हैं. यही विचार आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद सरकार में अधिक संगठित रूप में दिखाई देता है.
अक्सर दोनों की तुलना की जाती है, लेकिन दोनों की परिस्थितियां अलग थीं. 1915 में बनी काबुल सरकार मुख्य रूप से राजनीतिक और कूटनीतिक पहल थी. उसके पास न अपनी सेना थी और न किसी क्षेत्र पर वास्तविक नियंत्रण. वहीं 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में बनी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद सरकार के साथ आज़ाद हिंद फौज थी. उसे जापान सहित कई देशों की मान्यता भी मिली और उसने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का प्रशासन भी संभाला. फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि विदेश में भारतीय सरकार बनाने की अवधारणा का पहला संगठित प्रयास राजा महेंद्र प्रताप ने ही किया था.
इतिहासकार इसके कई कारण बताते हैं. सबसे पहला कारण यह है कि यह सरकार भारत की धरती पर काम नहीं कर सकी. दूसरा, प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां बदल गईं और यह प्रयास कमजोर पड़ गया. तीसरा, बाद के वर्षों में गांधी के नेतृत्व में चले जनआंदोलन और फिर नेताजी की आज़ाद हिंद सरकार ने अधिक व्यापक पहचान बना ली. इसी कारण काबुल की सरकार का उल्लेख अक्सर सीमित दायरे में रह गया.
सरल उदाहरण से इस तरह समझिए कि मान लीजिए किसी देश पर विदेशी कब्जा हो गया है. वहां के नेता अपने ही देश में सरकार नहीं बना सकते. ऐसी स्थिति में वे किसी दूसरे देश में जाकर एक अस्थायी सरकार बनाते हैं और दुनिया से कहते हैं- 'हम अपने देश के असली प्रतिनिधि हैं. कृपया हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई का समर्थन करें.' 1915 की काबुल सरकार का मूल उद्देश्य भी यही था.
● जन्मदिन पर बनी सरकार
भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा 1 दिसंबर 1915 को हुई, जो राजा महेंद्र प्रताप का जन्मदिन भी था.
● केवल राजा नहीं, शिक्षाविद भी थे
राजा महेंद्र प्रताप ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किए. वे सामाजिक सुधार और आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे.
● गांधी से पहले अंतरराष्ट्रीय अभियान
जब महात्मा गांधी भारत में बड़े जनआंदोलन शुरू कर रहे थे, उससे पहले ही राजा महेंद्र प्रताप विदेशों में भारत की आज़ादी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे.
● एक दूरदर्शी प्रयोग
हालांकि यह सरकार लंबे समय तक सक्रिय नहीं रह सकी, लेकिन इसने यह साबित किया कि भारतीय नेता विदेश में भी संगठित होकर स्वतंत्र सरकार की अवधारणा प्रस्तुत कर सकते हैं.