नई दिल्ली: बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर अपने देश में बढ़ते कट्टरपंथ और मानवाधिकारों की स्थिति पर खुलकर चिंता जताई है. कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में स्वतंत्र विचार रखने वालों के लिए माहौल लगातार मुश्किल होता जा रहा है. उन्होंने अपने निर्वासन के वर्षों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने केवल समान अधिकारों और मानवता की बात की थी, लेकिन इसकी कीमत उन्हें देश छोड़कर चुकानी पड़ी.
तसलीमा नसरीन ने कहा कि बांग्लादेश में कट्टरपंथ तेजी से फैल रहा है और इसका सबसे अधिक असर स्वतंत्र विचार रखने वाले लोगों पर पड़ रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुक्त चिंतकों को निशाना बनाया जा रहा है और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़ता जा रहा है. उनके अनुसार यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है.
अपने संबोधन में तसलीमा ने वर्ष 1994 में हुए निर्वासन का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था, बल्कि समाज में समानता और अधिकारों की बात लिखी थी. उनका कहना था कि जिस व्यवस्था को उनकी सुरक्षा करनी चाहिए थी, उसी ने उनके खिलाफ कार्रवाई की और उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया.
तसलीमा ने कहा कि कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई केवल धार्मिक उग्रवाद तक सीमित नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि वामपंथ का एक वर्ग भी मुस्लिम समाज को प्रगतिशील सोच से दूर रखने में भूमिका निभा रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि उन विचारों से है जो समाज को पीछे धकेलते हैं.
कार्यक्रम के दौरान उस समय माहौल कुछ देर के लिए तनावपूर्ण हो गया, जब तसलीमा ने वरिष्ठ कवि जय गोस्वामी को मंच पर बुलाया. दर्शकों के एक वर्ग ने इसका विरोध किया, जिसके बाद जय गोस्वामी मंच पर जाने के बजाय अपनी सीट पर लौट गए. विरोध की वजह उनके पुराने सार्वजनिक रुख को बताया गया.
अपने संबोधन के अंत में तसलीमा नसरीन ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियां स्थायी नहीं हैं. उन्होंने भरोसा जताया कि एक दिन बांग्लादेश फिर से उदार, लोकतांत्रिक और समान अधिकारों वाले समाज की दिशा में आगे बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि बदलाव कठिन जरूर होता है, लेकिन उम्मीद कभी खत्म नहीं होनी चाहिए.