कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. तमिलनाडु सरकार ने आरोप लगाया है कि कर्नाटक ने कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद निर्धारित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के निर्देश पर राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है.
तमिलनाडु ने अपनी याचिका में बताया कि 28 जुलाई को हुई CWRC की 139वीं बैठक में कर्नाटक को 29 जुलाई से 12 अगस्त तक लगातार 15 दिनों के लिए बिलिगुंडलु बिंदु पर प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया था. यह पानी कृष्णराज सागर (KRS) और काबिनी जलाशयों से छोड़ा जाना था. इसके बाद 30 जुलाई को CWMA की आपात बैठक में भी इसी फैसले की पुष्टि की गई.
राज्य सरकार का कहना है कि 29 जुलाई से 2 अगस्त के बीच बिलिगुंडलु में जल प्रवाह केवल 158 से 550 क्यूसेक के बीच दर्ज किया गया, जो निर्धारित 3,500 क्यूसेक से काफी कम है. तमिलनाडु का दावा है कि कर्नाटक के प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध है, इसलिए पानी छोड़ने में कोई व्यावहारिक बाधा नहीं थी. राज्य ने यह भी कहा कि जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण जलाशयों में लगातार पानी बढ़ रहा है.
याचिका में बताया गया है कि 3 अगस्त तक कृष्णराज सागर, काबिनी, हरंगी और हेमावती जलाशयों में कुल 77.537 टीएमसी पानी मौजूद था, जिसमें 67.517 टीएमसी उपयोग योग्य जल शामिल है. तमिलनाडु का कहना है कि अनुपातिक जल बंटवारे के आधार पर उसे बिलिगुंडलु पर 26.954 टीएमसी पानी मिलना चाहिए था, जबकि फिलहाल CWMA ने 4.536 टीएमसी पानी छोड़ने का निर्देश दिया था. आरोप है कि कर्नाटक ने इस निर्देश का भी पालन नहीं किया.
तमिलनाडु सरकार ने वरिष्ठ कानूनी सलाहकारों से परामर्श के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि कर्नाटक को कावेरी प्राधिकरण के आदेशों का पालन करने का निर्देश दिया जाए और तय समयसीमा के भीतर तमिलनाडु को उसका वैधानिक जल हिस्सा उपलब्ध कराया जाए. अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर दोनों राज्यों की नजरें टिकी हैं.