नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण मामले में पूर्वोत्तर राज्यों के अनुसूचित जनजाति समुदाय को मिल रही आयकर छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा कानून निर्माण और सरकारी नीति से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस पर फैसला लेना न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता. इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वह अपनी मांगों और सुझावों को संसद की समितियों तथा संबंधित सरकारी संस्थाओं के समक्ष रखे.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में उठाए गए सवाल मूल रूप से विधायी प्रकृति के हैं. अदालत ने माना कि ऐसे विषयों पर विचार करने और बदलाव करने का अधिकार संसद और नीति निर्माताओं के पास है. पीठ ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधि इन मुद्दों से भलीभांति परिचित हैं और आवश्यकता होने पर उचित निर्णय ले सकते हैं.
यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी. याचिका में आयकर अधिनियम 2025 की धारा 11 और अनुसूची-3 की क्रम संख्या 19 को चुनौती दी गई थी. इसमें कहा गया था कि पूर्वोत्तर के अधिसूचित क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय को बिना किसी आय सीमा या अन्य शर्त के आयकर से पूरी छूट दी जा रही है.
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि या तो इस प्रावधान को समाप्त किया जाए या फिर क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू की जाए. उनका तर्क था कि आर्थिक रूप से मजबूत वर्गों को भी समान रूप से लाभ मिलना उचित नहीं है. प्रस्ताव में कहा गया था कि एक निश्चित आय सीमा से ऊपर के लोगों को इस कर छूट के दायरे से बाहर किया जाए.
याचिका में यह भी कहा गया कि जिस उद्देश्य से यह छूट दी गई थी, समय के साथ परिस्थितियां बदल चुकी हैं. पिछले दो दशकों में पूर्वोत्तर राज्यों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और व्यापार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है. ऐसे में कर छूट की व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता बताई गई.
याचिकाकर्ता ने आयकर छूट की समय-समय पर समीक्षा करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी मांग की थी. उनका कहना था कि इससे यह तय किया जा सकेगा कि लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को विधायी मंचों के समक्ष अपनी बात रखने की सलाह दी.