नई दिल्ली: संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति ने पीएम विश्वकर्मा योजना को लेकर एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है. समिति का मानना है कि पारंपरिक पेशों को जाति से जोड़कर देखने की धारणा को बदलने की जरूरत है. इसी कारण समिति ने योजना में शामिल कई पेशों के नाम बदलकर उन्हें अधिक तटस्थ और कौशल आधारित बनाने की सिफारिश की है. इसका उद्देश्य यह है कि योजना अधिक समावेशी बने और देश के हर हिस्से में लोगों को बिना किसी सामाजिक पूर्वाग्रह के इसका लाभ मिल सके.
संसदीय समिति का कहना है कि पीएम विश्वकर्मा योजना में शामिल कुछ पेशों के नाम सीधे तौर पर जाति या पारंपरिक सामाजिक पहचान से जुड़े हुए हैं. इससे कई बार योजना की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है. समिति ने सुझाव दिया है कि इन पेशों के नामों को बदलकर उन्हें अधिक पेशेवर और कार्य आधारित बनाया जाए, ताकि लाभार्थियों की पहचान उनके कौशल के आधार पर हो सके, न कि किसी सामाजिक वर्ग से जोड़कर.
समिति ने उदाहरण देते हुए बताया कि मोची शब्द की जगह ‘जूते का कारीगर’ या ‘फुटवियर आर्टिजन’ जैसे नाम अपनाए जा सकते हैं. इसी तरह कुम्हार को ‘मिट्टी और सिरेमिक उत्पाद निर्माता’ कहा जा सकता है. वहीं नाई के लिए ‘व्यक्तिगत सौंदर्य सेवा प्रदाता’ जैसे तटस्थ शब्द इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है. समिति का मानना है कि इससे पेशों की गरिमा बढ़ेगी और पारंपरिक कारीगरों को नई पहचान मिलेगी.
समिति ने योजना के बजट को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के अनुसार 2026-27 के बजट अनुमान में योजना के लिए आवंटन घटाकर करीब 3,860.89 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जबकि 2025-26 में यह लगभग 25,100 करोड़ रुपये था. समिति का कहना है कि योजना में बड़ी संख्या में पंजीकरण हो रहे हैं, इसलिए बजट में इतनी बड़ी कमी पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए.
समिति ने सरकार से यह भी कहा है कि राज्यों और सामाजिक विशेषज्ञों के साथ चर्चा कर योजना के अंतर्गत पेशों की एक नई और मानकीकृत सूची तैयार की जाए. इससे देशभर में एक समान प्रणाली लागू की जा सकेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बदलावों से पारंपरिक कारीगरों को सम्मानजनक पहचान मिलेगी और वे आधुनिक उद्यमियों के रूप में आगे बढ़ने के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगे.