menu-icon
India Daily
share--v1

सिर्फ चर्बी वाला कारतूस नहीं था मंगल पांडे के बगावत की वजह, क्या आप जानते हैं भारत के इस अमर विद्रोही का सच

Mangal Pandey Death Anniversary: मंगल पांडे को हम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत करने वाले वीर सिपाही के रूप में जानते हैं. उनकी बगावत की चिंगारी ने देश को जगा दिया. लेकिन इतिहास के पन्नों में सिर्फ विद्रोह की तारीख ही दर्ज नहीं होती, वीरों के जीवन के अनछुए पहलू भी होते हैं, आइए जानते हैं मंगल पांडे के जीवन की कुछ अनकही कहानियां.

auth-image
India Daily Live
Mangal pandey

Mangal Pandey Death Anniversary: मंगल पांडे को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे पहले बिगुल फूंकने वाले सिपाही के रूप में जाना जाता है जिन्होंने धर्म के आधार पर हो रहे दुष्कर्मों के खिलाफ खुलकर विरोध किया था. इतना ही नहीं उन्हें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला जगाने वाले वीर सिपाही के रूप में भी जाना जाता है. 

मंगल पांडे के बगावत की कहानी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी है, लेकिन इसके बावजूद उनके जीवन के कई पहलू हैं जिनका नामो-निशान इतिहास के पन्नों में कहीं दर्ज नहीं है. इस वीर सिपाही की पुण्यतिथि के मौके पर आज हम उन अनकही कहानियों को उजागर करने का प्रयास कर रहे हैं.

एक रहस्यमयी बचपन

मंगल पांडे के बारे में इतिहास हमें बहुत कम जानकारी देता है. 1827 में बलिया जिले के नगवा गांव में जन्मे मंगल की शिक्षा-दीक्षा कैसी रही, उनके बचपन के सपने क्या थे, या उनके परिवार में कौन-कौन थे - ये सब इतिहास की गहराइयों में कहीं खो गए हैं. इतिहासकारों का मानना है कि शायद उनका बचपन किसी भी साधारण ग्रामीण बालक की तरह ही बीता होगा. खेती-बाड़ी में परिवार की मदद करना, गांव के मंदिर जाना, और लोक कथाओं को सुनना - शायद यही मंगल के बचपन की रूपरेखा रही होगी.

सन् 1849 में 22 वर्ष की आयु में वे अंग्रेजों की बंगाल नेटिव इन्फेंट्री में भर्ती हुए.  यहां से उनके जीवन का थोड़ा स्पष्ट दस्तावेजी चित्र मिलना शुरू होता है. सैनिक जीवन में मंगल अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान थे. साथी सैनिकों के अनुसार वे शांतचित्त और धर्मनिष्ठ व्यक्ति थे. हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मंगल ने छुपकर भारतीय सैनिकों को असंतोष के लिए लामबंद करना भी शुरू कर दिया था.

सैनिक जीवन और बढ़ता असंतोष

22 वर्षीय मंगल पांडे  अपने सैनिक जीवन में अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के लिए मशहूर थे जिन्हें अपने साथी सैनिकों के साथ मेलजोल रखने और उनकी परेशानियों को समझने के लिए जाना जाता था. हांलाकि गुलामी के आतंक के बीच पनप रहे विरोध की लौ से वो भी अछूते न रहे. भारत में 1857 से पहले ही अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ आक्रोश पनप रहा था.  इसमें एक बड़ा कारण था ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा भारतीयों का जबरन धर्म परिवर्तन कराना, संभव है कि मंगल पांडे भी इस आक्रोश से अछूते न रहे हों.

धीरे-धीरे अंग्रेजों का अहंकार और भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी उपेक्षा खटकने लगी. ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार ने भारतीय समाजिक व्यवस्था को तहस-नहस कर रखा था. सैनिकों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला जाता था, जो हिंदू और मुस्लिम धर्म के मूल्यों के विरुद्ध था.

विद्रोह का बिगुल और शहादत की राह

वहीं दूसरी तरफ, 1857 में नई एनफील्ड राइफल के लिए पेश किए गए चर्बी लगे कारतूसों ने आग में घी डालने का काम किया.  इन कारतूसों को दांत से खोलना पड़ता था, जो हिंदू और मुस्लिम सैनिकों की धार्मिक आस्थाओं के विरुद्ध था. यही वह घटनाक्रम माना जाता है जिसने मंगल पांडे के विद्रोह की ज्वाला को भड़का दिया.

यही वह घटनाक्रम माना जाता है जिसने मंगल पांडे के विद्रोह की ज्वाला को भड़का दिया. 24 मार्च 1857 को बैरकपुर की छावनी में मंगल पांडे ने विद्रोह का बिगुल बजाया. उन्होंने अपने अफसर पर गोली चला दी. हालांकि, उनका यह प्रयास असफल रहा. उन्हें पकड़ लिया गया और फौरन कोर्ट मार्शल द्वारा मृत्युदंड की सजा सुनाई गई. 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे को फांसी दे दी गई.

हालांकि, इतिहासकारों में इस बात को लेकर मतभेद है कि 24 मार्च 1857 को उन्होंने अकेले ही गोली चलाने का फैसला लिया था या किसी गुप्त विद्रोह योजना का हिस्सा थे. कुछ स्रोतों के अनुसार, उन्होंने अपने साथी सैनिकों को भी विद्रोह के लिए उकसाया था, लेकिन वे साथ देने में हिचकिचाए.

असफल विद्रोह, अमर बलिदान

भले ही मंगल पांडे का विद्रोह असफल रहा, लेकिन इसने ब्रिटिश राज की जड़ें हिला कर रख दीं. उनकी शहादत की खबर जंगल की आग की तरह फैली और सैनिकों में असंतोष की चिंगारी को भड़का दिया.  कुछ ही महीनों में 1857 का विद्रोह पूरे देश में फैल गया. यह विद्रोह भले ही दबा दिया गया, लेकिन इसने भारत के स्वाधीनता संग्राम को एक नई दिशा दी. मंगल पांडे की बलिदान ने देशभक्तों को एक प्रेरणा दी और यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय अब गुलामी की जंजीरों को सहने को तैयार नहीं हैं.

अनसुलझी पहेली: अकेला विद्रोह या गुप्त योजना?

मंगल पांडे के जीवन और उनके विद्रोह के पीछे के कारणों को लेकर इतिहासकारों में आज भी मतभेद हैं. फिर भी, यह निर्विवाद है कि उन्होंने अपने साहस और बलिदान से भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में एक अविस्मरणीय अध्याय लिखा.  मंगल पांडे की कहानी हमें याद दिलाती है कि क्रांति की ज्वाला अक्सर अनदेखे कोनों से उठती है, और एक व्यक्ति का साहस भी इतिहास का रुख मोड़ सकता है.