नई दिल्ली: देश के सरकारी और निजी बैंकों ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों में न्यूनतम बैलेंस न रखने वाले ग्राहकों से बड़ी राशि वसूली है. वित्त मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, बैंकों ने इस अवधि में करीब 19,000 करोड़ रुपये सिर्फ मिनिमम बैलेंस ना रखने के चार्ज के रूप में ग्राहकों से वसूले है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इस कुल राशि में निजी बैंकों का हिस्सा सबसे अधिक है. करीब 11,000 करोड़ रुपये प्राइवेट बैंकों ने मिनिमम बैलेंस चार्ज के रूप में वसूले हैं. वहीं, सरकारी बैंकों ने इस दौरान लगभग 8,093 करोड़ रुपये ग्राहकों से लिए हैं. इससे साफ होता है कि इस शुल्क से बैंकों को अच्छी-खासी आय होती रही है.
न्यूनतम बैलेंस ना रखने के चार्ज वसूलने के मामले में HDFC बैंक सबसे आगे रहा है. पिछले तीन सालों में इस बैंक ने अपने ग्राहकों से करीब 3,872 करोड़ रुपये का शुल्क वसूला. इसके बाद दूसरे स्थान पर एक्सिस बैंक का नाम आता है.
वहीं,सरकारी बैंकों की बात करें तो पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने इस मामले में सबसे अधिक चार्ज वसूला है.
पिछले कुछ वर्षों में कई सरकारी बैंकों ने ग्राहकों को राहत देने के लिए इस चार्ज को खत्म करने का फैसला लिया है. देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने मार्च 2020 में ही सेविंग अकाउंट में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाला जुर्माना पूरी तरह खत्म कर दिया था. इसके बाद PNB, केनरा बैंक सहित कुल 9 सरकारी बैंकों ने भी पिछले वर्ष से सेविंग अकाउंट पर यह शुल्क हटाने का निर्णय लिया. वहीं, कुछ अन्य बैंकों ने इस शुल्क को कम करने या नियमों को सरल बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में लिखित जवाब में बताया कि सरकारी बैंकों द्वारा पिछले तीन सालों में वसूले गए लगभग 8,092.8 करोड़ रुपये उनकी कुल आय का केवल 0.2 प्रतिशत ही हैं. उन्होंने कहा कि यह शुल्क मुख्य रूप से बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने की लागत को पूरा करने के लिए लिया जाता है और बैंकों की आय का बड़ा हिस्सा नहीं है.
सरकार का कहना है कि आम लोगों को बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ने के लिए जीरो बैलेंस सेविंग अकाउंट की सुविधा दी जा रही है. देश में इस समय करीब 72 करोड़ बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट हैं, जिनमें प्रधानमंत्री जन धन योजना के खाते भी शामिल हैं. सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था का उद्देश्य गरीब और छोटे जमाकर्ताओं तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना और देश में वित्तीय समावेशन को मजबूत बनाना है.