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कभी नहीं गए स्कूल, बनाए IIT और UGC जैसी संस्थान! जानिए भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद की प्रेरक कहानी

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कभी स्कूल की पढ़ाई नहीं की, लेकिन स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री बनकर IIT, UGC और कई राष्ट्रीय संस्थानों की नींव रखी.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
कभी नहीं गए स्कूल, बनाए IIT और UGC जैसी संस्थान! जानिए भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद की प्रेरक कहानी
Courtesy: @Gabbar0099

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जीवन भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरक कहानियों में गिना जाता है. हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कभी किसी स्कूल या कॉलेज में औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की. उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन पश्चिमी शिक्षा के पक्षधर नहीं थे और उन्होंने आज़ाद की पढ़ाई घर पर ही कराई. हालांकि, घर में मिली गहन शिक्षा, स्वाध्याय और ज्ञान की निरंतर तलाश ने उन्हें ऐसा विद्वान बनाया, जिसने आगे चलकर आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी.

कम उम्र में ही बन गए विद्वान और पत्रकार

1888 में मक्का में जन्मे मौलाना आज़ाद बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे. बताया जाता है कि दस वर्ष की उम्र से पहले ही उन्होंने फ़ारसी शब्दकोश तैयार करने का काम शुरू कर दिया था. किशोरावस्था में उन्होंने कविता लिखना शुरू किया और 15 वर्ष की उम्र में साहित्यिक पत्रिका 'लिसान-उस-सिद्क' का संपादन करने लगे. बाद में उन्होंने 'अल-हिलाल' और 'अल-बलाग' जैसे अखबारों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ वैचारिक संघर्ष छेड़ा और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.

विभाजन का विरोध, एकता का संदेश

मौलाना आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे. वे 35 वर्ष की आयु में कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने. उन्होंने देश के विभाजन का खुलकर विरोध किया और हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत की. 1947 में विभाजन के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद से दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने भारतीय मुसलमानों से देश न छोड़ने और भारत के भविष्य पर भरोसा रखने की अपील की थी.

IIT, UGC और शिक्षा सुधारों की रखी नींव

15 अगस्त 1947 के बाद मौलाना आज़ाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने और फरवरी 1958 तक इस पद पर रहे. उनके कार्यकाल में IIT खड़गपुर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना हुई. उन्होंने तकनीकी शिक्षा, विश्वविद्यालय सुधार, शिक्षक प्रशिक्षण, महिला शिक्षा, वयस्क साक्षरता और निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया.

तकनीकी शिक्षा को दी नई दिशा

मौलाना आज़ाद का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब देश विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने. उनके प्रयासों से तकनीकी शिक्षा का विस्तार हुआ और इंजीनियरों, वैज्ञानिकों तथा शोधकर्ताओं की नई पीढ़ी तैयार करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए. उन्होंने शिक्षा को केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार माना.

आज भी प्रेरणा देती है मौलाना आज़ाद की विरासत

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सीखने की इच्छा और ज्ञान के प्रति समर्पण किसी औपचारिक डिग्री से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है. उन्होंने कभी अपने निजी अनुभव के आधार पर संस्थागत शिक्षा का महत्व कम नहीं आंका, बल्कि ऐसी संस्थाएं खड़ी कीं जिन्होंने करोड़ों भारतीयों को शिक्षा और अवसर उपलब्ध कराए. आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था में उनका योगदान आज भी मील का पत्थर माना जाता है.