सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से चुनाव आयोग को बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को राहत देते हुए कहा है कि फॉर्म 17सी की प्रतियां तत्काल चुनाव आयोग को अपलोड करने की जरूरत नहीं है. याचिका में मांग की गई थी कि फॉर्म 17सी की प्रतियों को अपलोड कर दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अब छठवें चरण के चुनाव शनिवार को होने वाले हैं. अब इस मामले की सुनवाई चुनाव के बाद होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की वैकेशन बेंच ने इस केस की सुनवाई की है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा ने चुनाव आयोग को राहत देने वाला फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट में यह केस एक NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने दायर की थी. एक याचिका तृणमूल कांग्रेस की सासंद महुआ मोइत्रा ने साल 2019 में दायर की थी, उसकी भी सुनवाई हुई.
पढ़ें सुनवाई के दौरान कोर्ट में क्या सुप्रीम कोर्ट और याचिकाकर्ता ने कहा-
- जस्टिस दत्ता ने केस की सुनवाई के दौरान कहा, '5 चरण के चुनाव हो गए हैं. कल छठवें चरण का चुनाव है. सिर्फ इसी काम में लोगों की जरूरत पड़ेगी. हमें जमीनी हकीकत के बारे में सोचना चाहिए. हमें लगता है कि वैकेशन के बाद हमें इसकी सुनवाई करनी चाहिए.'
- इसके जवाब में अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, 'वैलेट पेपर और इसे लेकर साल 2019 से मुद्दा उठा है. अब 2014 के चुनाव खत्म होने वाले हैं. अगर अब तक इस केस पर फैसला नहीं आता है तो यह देरी होगी. अधिकतम 10 लाख 17सी फॉर्म कुल 543 लोकसभाओं में होंगे. इसे अपलोड किया जा रहा है. उनके पास सेना भी है.'
- सुनवाई के दौरान कोर्ट में चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा, 'यह याचिका केवल शक के आधार पर दायर की गई है. चुनाव कराना बेहद कठिन काम है, इसमें किसी का व्यक्ति के व्यक्तिगत हितों के लिए सिर्फ दखल नहीं देना चाहिए.'
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सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा है कि अंतरिम आवेदन में प्रार्थनाएं, साल 2019 में दायर मुख्य रिट पिटिशन की तरह ही है. अंतरिम आवेदन में भी राहत नहीं मांगी जा सकती, इसलिए दोनों केस को एक साथ ही सुना जाएगा. जस्टिस दत्ता ने कहा कि चुनावों के बीच व्यवहारिक रुख अपनाना होगा. आवेदन को मेन पिटिशन के साथ ही सुना जाना चाहिए. हम प्रक्रिया को बाधित नहीं करना चाहिए. हमें अथॉरिटी पर थोड़ा भरोसा करना चाहिए.
क्यों डेटा सार्वजनिक नहीं करना चाहता है चुनाव आयोग?
चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि ऐसी मांग का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता है कि आम आदमी को फॉर्म 17सी की जानकारी होनी चाहिए. इलेक्शन रूल्स के तहत फॉर्म 17सी, केवल उम्मीदवार के पोलिंग एजेंट को दिया जा सकता है. चुनाव आयोग ने कहा कि फॉर्म 17सी को अगर चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए तो यह गलत होगा और वोटरों को प्रभावित और भ्रमित कर सकता है. इससे वोटरों का भरोसा उठ सकता है.