हिमालय की बर्फीली चोटियां भारत के लिए पानी का बड़ा स्रोत हैं, लेकिन बदलता मौसम इन्हीं पहाड़ों में एक गंभीर खतरा भी पैदा कर रहा है. ग्लेशियरों के पिघलने से नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार बढ़ रहा है. अगर इन झीलों का प्राकृतिक बांध अचानक टूट जाए तो कुछ ही समय में तेज बहाव वाली बाढ़ नीचे की घाटियों में तबाही मचा सकती है. यही खतरा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के रूप में सामने आता है.
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की रिसर्च के मुताबिक हिमालय क्षेत्र में करीब 8,357 से 9,280 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें 1990 के बाद 1,052 नई झीलें बनी हैं. केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में 2,485 झीलें हैं, जिनमें 56 को बेहद उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है. विशेषज्ञों के लिए चिंता की बात यह भी है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है.
ग्लेशियर खुद किसी बम की तरह नहीं फटता. असली खतरा उसके पिघलने से बनी झील से होता है. ग्लेशियर अपने साथ मिट्टी, पत्थर और चट्टानों का मलबा लाता है, जो प्राकृतिक बांध यानी मोरेन बना सकता है. झील में पानी बढ़ने, भूस्खलन, हिमस्खलन, भारी बारिश या भूकंपीय गतिविधि से यह बांध टूट जाए तो पानी और मलबा तेजी से घाटी की ओर बहता है.
भारत में लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश ग्लेशियल झीलों के लिहाज से संवेदनशील हैं. केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 432 झीलों का विस्तार दर्ज किया गया है. इनमें अरुणाचल प्रदेश की 197 झीलें, लद्दाख की 120 और जम्मू-कश्मीर की 57 झीलें शामिल हैं. अचानक सैलाब आने पर सड़क, पुल, गांव और जलविद्युत परियोजनाएं सीधे प्रभावित हो सकती हैं.
भारत और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं का असर पहले भी दिख चुका है. 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की चमोली त्रासदी और 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील से आई बाढ़ इसके बड़े उदाहरण हैं. इन घटनाओं में पानी के साथ भारी मलबा नीचे आया और पुलों, सड़कों तथा बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ. नेपाल में भी ग्लेशियल झीलों और भूस्खलन से जुड़ी बाढ़ें सामने आती रही हैं.
ग्लेशियरों के टूटने की हर घटना को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन जोखिम कम किया जा सकता है. ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण, कार्बन उत्सर्जन में कमी और संवेदनशील झीलों की लगातार निगरानी अहम उपाय हैं. सैटेलाइट, ड्रोन, सेंसर और जमीन पर लगे उपकरणों से झीलों में बदलाव पहचाना जा सकता है. समय रहते चेतावनी मिलने पर निचले इलाकों को खाली कराने और नुकसान घटाने का मौका मिल सकता है.