पुणे में एक किशोर की तेज रफ्तार पोर्शे कार से भिड़कर बाइक सवार दो लोगों की मौत हो गई. पुणे की जुवेनाइल कोर्ट ने एक निबंध लिखकर उसे छोड़ने की भूमिका तैयार कर ली थी. हंगामा हुआ तो अदालत को जमानत याचिका पर दिए गए अपने फैसले में बदलाव करना पड़ा. उत्तराखंड में एक किशोर ने एक लड़की का एमएमएस वायरल कर दिया तो लड़की ने आत्महत्या कर दी. सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका पर रोक लगाई और कड़े अनुशासन का हवाला दिया. देश में कई बार ऐसे कांड नाबालिग करते हैं, जिन्हें सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी लेकिन उन्हें सजा बालिगों की तरह नहीं मिलती.
नाबालिग अपराध करे और वही अपराध एक आम आदमी करे तो दोनों को होने वाली सजा में जमीन आसमान का फर्क होता है. साल 2012 के निर्भया कांड में जिस आरोपी का कांड सबसे जघन्य था, वह नाबालिग होने की वजह से आजाद होकर घूम रहा है लेकिन उसके सह-आरोपियों को फांसी हो गई. किशोर न्याय को लेकर बना जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJA) एक बार फिर से चर्चा में है. आइए जानते हैं क्या है ये कानून, इस कानून से जुड़ी सभी अहम बातें.
क्या है जुवेनाइल जस्टिस एक्ट?
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के बारे में इस अधिनियम की प्रास्तवाना कहती है कि जो किशोर बच्चे, जिनकी उम्र 18 वर्ष से कम है, अगर वे कोई अपराध करते हैं, कानून तोड़ते हैं तो भी वे देखरेख और संरक्षण से अयोग्य नहीं हो जाते. उन पर नजर रखने और उनके सुधार के लिए ही यह अधिनियम लाया गया है. उन्हें जिस जेल में रखा जाता है, उसे बाल सुधार गृह कहते हैं. इसे कानूनी भाषा में जेल नहीं, सुधार गृह कहते हैं. जितने दिन इस बच्चों को सुधार गृह में रखा जाता है, उनकी मानसिक काउंसलिंग भी की जाती है, जिससे वे अपराध की दुनिया छोड़कर बाहर निकलें और समाज की मुख्य धारा में शामिल हों.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट संविधान के अनुच्छेद 15 के खंड (3), अनुच्छेद 39 के खंड (ड) और अनुच्छेद 45 और 47 के उपबंधों के आधार पर तैयार हुआ है. अनुच्छेद 15 धर्म, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करने की बात करता है. इसका सब क्लॉज (3) बात करता है कि यह अनुच्छेद, बच्चों के लिए ऐसे कानून बनाने से नहीं रोकेगा, जिससे इन्हें लाभ पहुंचे. इन अनुच्छेदों के मद्देनजर, यह अधनियिम, बच्चों के मूलभूत अधिकारों और जरूरतों को देखते हुए तैयार किया गया है.
कब हुआ अधिनियम में संशोधन?
भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली की ओर से बच्चों के अधिकारों से संबंधित सभी कन्वेंशन, जिसमें बच्चों के हितों की बात की गई है, उन पर सहमति जताई है. भारत ने 11 दिसंबर 1992 को इन पर हस्ताक्षर किए थे. ऐसे बच्चे जो कानून तोड़ते हैं, उनके लिए संयुक्त राष्ट्र स्टैंडर्ड मिनिम रूल्स 1985 और यूनाइडेट नेशंस जुवेनाइल प्रोटेक्टशन रूल्स 1990 को ध्यान में रखते हुए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 का गठन हुआ था, जिसमें साल 2015 में संशोधन हुआ था.
संशोधन के बाद बदला क्या है?
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के नए प्रावधानों के मुताबिक, अगर वे बलात्कार या हत्या जैसे संगीन अपराध करते हैं लेकिन उनकी उम्र 16 से 18 साल के बीच है तो वे कठिन सजा पाने के अधिकारी होंगे. उन्हें ऐसे अपराधों में 7 साल तक की सजा हो सकती है. जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ही तय करता है कि किसी जुवेनाइल का ट्रायल अडल्ट के तौर पर होगा या नहीं. पुलिस ऐसे मामलों में अनुरोध कर सकती है.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 15, आरोपी किशोर की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं की बात करता है, अगर वह अपने कृत्य के परिणाम से वाकिफ है तो उसका ट्रायल एडल्ट के तौर पर होगा. बोर्ड उन परिस्थितियों पर भी विचार करता है, जिनकी वजह से अपराध हुआ है. ऐसे मामलों के परीक्षण के लिए बोर्ड मानोचिकित्सकों की राय भी ले सकता है.
सिर्फ इसलिए बनाया गया है ये एक्ट
- सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकार्ड विशाल अरुण मिश्र बताते हैं कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का गठन, कानून तोड़ने वाले बच्चों की गिरफ्तारी, उनकी हिरासत, कोर्ट प्रोसीडिंग, जेल, पुनर्वास और समाज की मुख्य धारा में लौटने से जुड़े प्रावधानों को तय करने के लिए हुआ है. अगर बच्चा अपनी कैद पूरी करके बाहर निकलता है तो उसकी आजीविका के लिए भी सरकार व्यवस्था कराती है. सुधार गृह में उन्हें पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार तक की ट्रेनिंग दी जाती है, यह बालक के तौर पर उनके अधिकारों का संरक्षण है, जो उनके अपराधी होने से खत्म नहीं हो जाता है.
- 18 साल से कम उम्र के बच्चे, हो सकता है कि आवेश में कुछ कर बैठते हों. उनके सामने लंबी जिंदगी पड़ी होती है, इसलिए उन्हें सुधरने का अवसर, यह अधिनियम देता है. इस जेल को जेल नहीं, सुधारगृह भी इसीलिए कहा जाता है.
किशोरों के लिए कैसे काम करता है यह अधिनियम?
- निर्दोषिता के सिद्धांत पर यह अधिनियम काम करता है. अगर 18 साल से कम उम्र का अपराधी है तो भी उसे क्रिमिनल इंटेशन के तहत दोषी नहीं माना जाता है.
- यह अधिनियम बच्चों के अधिकार, उनके फेयर कोर्ट ट्रायल और बच्चे के तौर पर उनके नजरिए को सुधारने की बात करता है.
- बच्चों के लिए बना यह अधिनियम, सुधारवादी नजरिए पर आधारित है, न कि दंडात्मक नजरिए पर.
किन मामलों में बच्चों की हिफाजत के लिए दीवार बनकर खड़ा है यह एक्ट?
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में यह प्रावधान है कि जघन्य अपराध करने के बाद भी 18 साल से कम आयु के किशोर पर बालिग की तरह केस तो चलाया जा सकता है लेकिन उसे मृत्युदंड या आजीवन कारावास नहीं दिया जा सकता है. जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश की अपील 30 दिन के अंदर चाइल्ड कोर्ट में पेश किया की जा सकती है. अगर यहां से राहत न मिले तो हाई कोर्ट का रुख किया जा सकता है.
पुणे में अगर आरोप सच हुए तो कितनी सजा काटेगा नाबालिग?
पुणे हादसे में नाबालिग पर लापरवाही की वजह से मौत का केस चल सकता है. इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 304ए लग सकती है. इस अपराध में अधिकतम सजा 2 साल की होती है लेकिन इसे संगीन अपराध नहीं माना जाता है.
क्यों हुआ था इस एक्ट में संशोधन?
साल 2012 का निर्भया कांड. तब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 लागू था. दिल्ली की चलती बस में एक लड़की का गैंगरेप हुआ था. रेप करने वालों में एक नाबालिग भी था, जिसने पैरामेडिकल की स्टूडेंट के साथ हैवानियत की थी. उसके बलात्कार और हत्या पर देशभर में आक्रोश की लहर पैदा हो गई थी. बहस से छिड़ी कि उस आरोपी की उम्र 16 साल थी लेकिन उसे जो सजा मिली वह नाकाफी थी. वह सजा मिलने के 3 साल के भीतर ही छूट गया. वजह ये थी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बच्चों के पुनर्वास से संबंधित था, न कि उन्हें सजा देने के लिए इसे अधिनियमित किया गया था. निर्भया का दोषी बच्चा आजाद कहीं घूम रहा होगा. नाबालिगों के बढ़ते अपराधों को लेकर ही नए संशोधन लाए गए थे.