menu-icon
India Daily

'घर संभालने वाली महिला आलसी नहीं...', दिल्ली हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर सुनाया ऐतिहासिक फैसला

मामला वर्ष 2012 में हुई शादी से जुड़ा है. पत्नी का आरोप है कि वर्ष 2020 में पति ने उसे और नाबालिग बेटे को छोड़ दिया. इसके बाद पत्नी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत अंतरिम मेंटेनेंस की मांग की.

Anuj
Edited By: Anuj
'घर संभालने वाली महिला आलसी नहीं...', दिल्ली हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर सुनाया ऐतिहासिक फैसला
Courtesy: Chat GPT

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते से जुड़े एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि घर संभालने वाली महिला को 'आलसी' नहीं कहा जा सकता. जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा ने 16 फरवरी को दिए आदेश में कहा कि घरेलू काम, बच्चों की देखभाल और परिवार की जिम्मेदारियां भी श्रम हैं, जिनका आर्थिक महत्व है, भले ही उनका सीधा भुगतान न होता हो.

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि गृहिणी खाली नहीं बैठती, बल्कि उसके योगदान से कमाने वाला पति अपने काम पर ध्यान केंद्रित कर पाता है. ऐसे में मेंटेनेंस तय करते समय पत्नी के योगदान को नजरअंदाज करना न्यायसंगत नहीं है.

अपीलीय अदालत से राहत नहीं

मामला वर्ष 2012 में हुई शादी से जुड़ा है. पत्नी का आरोप है कि वर्ष 2020 में पति ने उसे और नाबालिग बेटे को छोड़ दिया. इसके बाद पत्नी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत अंतरिम मेंटेनेंस की मांग की. मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि पत्नी शिक्षित और सक्षम है, लेकिन उसने नौकरी नहीं की. अपीलीय अदालत से भी उसे कोई राहत नहीं मिली.

पति ने दलील में क्या कहा?

दिल्ली हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि वह बेटे की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है और पत्नी खाली बैठकर भत्ता नहीं मांग सकती. इसके जवाब में हाईकोर्ट ने कहा कि कमाने की क्षमता और वास्तविक कमाई दोनों अलग-अलग है. केवल इस आधार पर कि पत्नी काम करने में सक्षम है, उसे मेंटेनेंस से वंचित नहीं किया जा सकता.

'ऐसी सोच को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता'

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय समाज में अक्सर शादी के बाद महिलाओं से नौकरी छोड़ने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन बाद में उसी आधार पर भत्ता देने से बचने की कोशिश की जाती है. ऐसी सोच को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता.

'आपसी बातचीत और सुलह बेहतर विकल्प'

रिकॉर्ड में पत्नी की किसी आय का प्रमाण न होने पर अदालत ने घरेलू हिंसा कानून के तहत उसे 50 हजार रुपये अंतरिम मेंटेनेंस देने का आदेश दिया. कोर्ट ने यह भी माना कि परिवार के लिए करियर छोड़ने वाली महिला बाद में उसी स्तर और वेतन पर नौकरी शुरू नहीं कर सकती. और साथ ही अदालत ने सुझाव दिया कि मेंटेनेंस के मामले अक्सर टकरावपूर्ण हो जाते हैं, इसलिए लंबी कानूनी लड़ाई की बजाय आपसी बातचीत और सुलह बेहतर विकल्प हो सकता है.