अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले में सदियों से इस्तेमाल होने वाला जंगली हिमालयी मसाला 'खागी' अब स्थानीय लोगों की आर्थिक मजबूती का आधार बन गया है. अलग-अलग जनजातियों में इसे खागी, एरमा, श्येइन और यार्मा जैसे नामों से जाना जाता है. इसकी तीखी साइट्रस खुशबू और जीभ पर हल्की झनझनाहट पैदा करने वाला स्वाद इसे खास बनाता है. कभी केवल पारंपरिक भोजन और घरेलू उपयोग तक सीमित यह मसाला अब रोजगार और संरक्षण का नया माध्यम बन चुका है.
मंडाला फुडुंग खेलोंग कम्युनिटी कंजर्व्ड एरिया (CCA) में स्थानीय समुदायों ने WWF-India के सहयोग से खागी की सामूहिक कटाई, संग्रह और बिक्री की व्यवस्था विकसित की. पहले किसान अलग-अलग व्यापारियों को अलग-अलग कीमतों पर मसाला बेचते थे, लेकिन अब सामूहिक मॉडल के जरिए उन्हें बेहतर दाम और स्थायी बाजार मिल रहा है. इस पहल ने मसाले के छिलके के साथ-साथ उसके बीजों की भी व्यावसायिक उपयोगिता बढ़ा दी है.
पिछले दो कटाई सत्रों (2024-2026) के दौरान समुदायों ने 10 मीट्रिक टन से अधिक जैंथोक्साइलम (Zanthoxylum) की बिक्री की. इससे 200 से अधिक परिवारों को लाभ मिला और लगभग 39 लाख रुपये का कारोबार हुआ. इनमें से करीब 6 लाख रुपये सामुदायिक संरक्षण कोष में जमा किए गए. स्थानीय परिवारों को हर सीजन में औसतन 5,000 से 10,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है, जो उनकी खेती से होने वाली कमाई में महत्वपूर्ण सहयोग देती है.
#DidYouKnow Zanthoxylum, locally known as Khagei or Zabrang, is an essential condiment in the Monpa area of Western Arunachal Pradesh. It is part of the local diet and used as chutney and pickle.
— WWF-India (@WWFINDIA) March 21, 2020
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इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मसाले की बिक्री से होने वाली आय का एक हिस्सा वन संरक्षण, जैव विविधता निगरानी और सामुदायिक कल्याण पर खर्च किया जाता है. इससे ग्रामीणों को जंगलों की सुरक्षा का सीधा आर्थिक लाभ मिलने लगा है. यही कारण है कि अब लोग केवल संसाधनों का दोहन नहीं, बल्कि उनके संरक्षण को भी अपनी जिम्मेदारी मान रहे हैं.
यह क्षेत्र भूटान के सकतेंग वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी से जुड़ा हुआ है और कई दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है. यहां रेड पांडा, हिमालयी काला भालू, क्लाउडेड लेपर्ड, एशियन गोल्डन कैट और कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं. इसके अलावा कई औषधीय पौधे भी स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं का हिस्सा हैं. सामुदायिक संरक्षण मॉडल इन प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि खागी का यह मॉडल केवल मसाले के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था मिलकर ग्रामीण विकास का मजबूत आधार बन सकते हैं. सामुदायिक भागीदारी से जंगलों का संरक्षण, किसानों की आय में वृद्धि और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल रही है. यह पहल देश के अन्य वन क्षेत्रों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरी है.