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India Daily

'गैर-हिंदुओं को भी मिले मंदिरों में प्रवेश', बोले शिवगिरी मठ के अध्यक्ष, मुस्लिम युवती के मंदिर के तालाब में पैर धोने पर हुआ था विवाद

गुरुवायूर मंदिर में एक मुस्लिम युवती के पैर धोने के बाद शुद्धिकरण अनुष्ठान किए जाने पर विवाद गहरा गया है. वहीं पूरे विवाद के बीच शिवगिरी मठ के अध्यक्ष स्वामी सचिदानंद का बयान सामने आया है. उन्होंने कहा है कि ऐसे समय में पुरानी परंपराओं को छोड़कर गैर-हिंदुओं को भी मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
'गैर-हिंदुओं को भी मिले मंदिरों में प्रवेश', बोले शिवगिरी मठ के अध्यक्ष, मुस्लिम युवती के मंदिर के तालाब में पैर धोने पर हुआ था विवाद
Courtesy: web

केरल के गुरुवायूर मंदिर में एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर द्वारा तालाब में पैर धोने को लेकर हुए विवाद ने राज्य में नई बहस छेड़ दी है. जहां मंदिर प्रशासन ने इसे ‘अपवित्रता’ मानकर छह दिन तक शुद्धिकरण अनुष्ठान किए, वहीं शिवगिरी मठ के अध्यक्ष स्वामी सचिदानंद ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब समय आ गया है जब गैर-हिंदुओं को भी मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दी जाए.

गुरुवायूर मंदिर में फैशन इन्फ्लुएंसर जैस्मिन जाफर ने वीडियो शूट करते समय तालाब में पैर धोए थे. इसे गंभीर अपराध मानते हुए मंदिर प्रबंधन ने 19 शिवेलियां, 19 विशेष पूजाएं और कई बार शुद्धिकरण अनुष्ठान किए. इस कदम पर स्वामी सचिदानंद ने आपत्ति जताई और कहा कि यह प्रथा आज के प्रगतिशील समाज के अनुकूल नहीं है.

ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला

स्वामी सचिदानंद ने याद दिलाया कि कभी पिछड़ी जातियों और ईझवा समुदाय को भी मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता था. माना जाता था कि उनकी मौजूदगी से मंदिर अपवित्र हो जाएगा. लेकिन ‘टेम्पल एंट्री प्रोकेलेशन’ ने इस भेदभाव को खत्म किया और इससे हिंदू धर्म तथा मंदिर उपासना दोनों और मजबूत हुए. उन्होंने कहा कि जैसे तब बदलाव हुआ, वैसे ही अब गैर-हिंदुओं को मंदिरों में आने की इजाजत देने पर विचार करना चाहिए.

सोशल मीडिया पर हुआ विवाद

जैस्मिन जाफर का वीडियो वायरल होने के बाद भारी विरोध हुआ. उन्होंने इंस्टाग्राम से वीडियो हटा दिया और सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगी. बावजूद इसके, मंदिर प्रशासन ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू कर दी है. इस पूरे प्रकरण ने सोशल मीडिया और समाज में व्यापक बहस को जन्म दिया है.

मंदिरों को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखें

स्वामी सचिदानंद का कहना है कि मंदिरों को केवल एक धर्म तक सीमित रखने के बजाय उन्हें आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जब पिछली पीढ़ियों ने भेदभाव खत्म करके समानता का रास्ता अपनाया, तो अब समय है कि गैर-हिंदुओं को भी प्रवेश का अधिकार मिले. इससे न सिर्फ मंदिर संस्कृति मजबूत होगी बल्कि समाज में सामूहिक सद्भाव भी बढ़ेगा.