नई दिल्ली: सर्दियां जहां ठंडी हवाओं और आरामदायक माहौल का अहसास कराती हैं, वहीं कई बुजुर्गों के लिए यह मौसम मानसिक सेहत पर बोझ बनकर भी उभरता है. तापमान गिरते ही बुजुर्गों में अवसाद बढ़ने की घटनाएं तेजी से सामने आती हैं, जिसका सीधा असर उनके मूड, ऊर्जा और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सूरज की कम रोशनी, घर में सीमित गतिविधियां और बढ़ती अकेलापन की भावना बुजुर्गों को भावनात्मक रूप से और भी संवेदनशील बना देती है.
ऐसे में बुजुर्गों के व्यवहार, बातचीत और दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव भी अवसाद के शुरुआती संकेत हो सकते हैं, जिन्हें परिवार को समझना बेहद जरूरी है. सही समय पर देखभाल और ध्यान मिल जाए तो सर्दी का यह भावनात्मक बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है, और बुजुर्ग फिर से मानसिक रूप से बेहतर महसूस कर सकते हैं.
सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं. इससे सूरज की रोशनी कम मिलती है, जिससे सेरोटोनिन का स्तर गिर जाता है. यही रसायन दिमाग को खुश रखता है. इसकी कमी से बुजुर्गों में उदासी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है.
उम्र बढ़ने पर बाहरी गतिविधियां कम हो जाती हैं. ठंड के कारण बुजुर्ग कम बाहर निकलते हैं, जिससे सामाजिक दूरी बढ़ती है. अकेलापन मानसिक तनाव और अवसाद को गहरा कर सकता है. परिवार के साथ समय बिताना इस समस्या को कम करता है.
अवसाद के लक्षणों में लगातार उदासी, ऊर्जा की कमी, नींद में बदलाव, नकारात्मक सोच, भूख कम होना और किसी भी गतिविधि में रुचि न लेना शामिल है. अगर ये लक्षण दो सप्ताह से ज्यादा बने रहें, तो डॉक्टर से संपर्क जरूरी है.
ठंड में धूप कम लेने से विटामिन डी की कमी बढ़ जाती है. यह न केवल हड्डियों को प्रभावित करता है, बल्कि दिमाग में मौजूद न्यूरोकेमिकल्स को भी प्रभावित करता है, जो मूड नियंत्रित करते हैं. रोजाना कुछ समय धूप में बैठना मानसिक स्थिति सुधार सकता है.
बुजुर्गों को नियमित धूप, हल्की एक्सरसाइज, हर्बल चाय, संगीत, और परिवार के साथ बातचीत करने की सलाह दी जाती है. योग और मेडिटेशन भी तनाव कम करने में कारगर हैं. डॉक्टर के सुझाव के तहत थेरेपी या दवाइयां भी मददगार हो सकती हैं.
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