आज के समय में ब्लूटूथ हेडफोन्स और ईयरबड्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. मोबाइल फोन से लगातार जुड़े रहने के लिए बिना तार वाले ये उपकरण बेहद सुविधाजनक हैं. लेकिन इनके इस्तेमाल के साथ एक सवाल अक्सर उठता है कि क्या इनसे निकलने वाली रेडिएशन दिमाग के लिए खतरनाक हो सकती है? क्या ये ब्रेन ट्यूमर या कैंसर का खतरा बढ़ाती है? इसी चिंता को दूर करने के लिए विशेषज्ञों ने साफ किया है कि ब्लूटूथ डिवाइस सुरक्षित माने जाते हैं और इनसे कैंसर होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है.
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट के न्यूरो एंड स्पाइन ऑन्कोलॉजी सर्विसेज के चीफ, डॉक्टर प्रोफेसर ईश्वर चंद्र प्रेमसागर के मुताबिक ब्लूटूथ ईयरफोन्स से निकलने वाली रेडिएशन नॉन-आयनाइजिंग होती है. ऐसी तरंगें DNA को नुकसान नहीं पहुंचातीं और न ही वे शरीर की कोशिकाओं को तोड़ती हैं. चूंकि कैंसर की शुरुआत DNA में बदलाव से ही होती है, इसलिए ब्लूटूथ डिवाइस को कैंसर के खतरे से नहीं जोड़ा जा सकता.
विशेषज्ञों का कहना है कि ब्लूटूथ ईयरफोन्स की रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बहुत कम होती है. फोन को कान पर लगाकर बात करने के दौरान शरीर को ज्यादा रेडिएशन मिलती है. इसके मुकाबले ईयरबड्स बेहद कम ऊर्जा पर काम करते हैं. अब तक किसी भी शोध में ब्लूटूथ डिवाइस और ब्रेन ट्यूमर के बीच सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है, इसलिए इनके उपयोग को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है.
हालांकि ब्लूटूथ रेडिएशन से कैंसर का खतरा नहीं बढ़ता, लेकिन लगातार कई घंटों तक ईयरफोन्स लगाए रखने से सुनने की क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है. विशेषज्ञ '60-60 नियम' अपनाने की सलाह देते हैं- यानी 60% से कम आवाज पर और 60 मिनट से ज्यादा लगातार उपयोग न करें. गेमिंग या दफ्तर के काम में ईयरबड्स का लंबे समय तक उपयोग करने वालों के लिए यह नियम और भी जरूरी है.
गाड़ी चलाते हुए ईयरफोन्स का उपयोग न करें और जहां संभव हो, फोन को कान से दूर रखकर स्पीकर पर बात करें. विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि ब्रेन ट्यूमर के कुछ लक्षण पहचानना जरूरी है- जैसे लगातार सिरदर्द, उल्टी, सुनने या देखने में कमी, या व्यक्तित्व में बदलाव. ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए, क्योंकि समय रहते पहचाना गया रोग जल्दी नियंत्रित किया जा सकता है.