4 अगस्त 1929 को जन्में किशोर कुमार भारतीय सिनेमा का ऐसा नाम जिन्हें उनके अभिनय और गायन के लिए पीढ़ियों तक याद किया जाएगा. उन्होंने अभिनय और गायन दोनों में ही अविश्वसनीय काम किया है, जिन्हें भूल पाना फैंस के लिए संभव नहीं है. किशोर दा ने देव आनंद, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन समेत कई बड़े सितारों के लिए गाना गाया है.
लेकिन खुद के कुछ गानें ऐसे हैं जिनमें उन्हें मोहम्मद रफी साहब की आवाज का सहारा लेना पड़ा. आमतौर पर किशोर कुमार अपनी फिल्मों में खुद ही गाते थे, लेकिन कुछ खास मौकों पर संगीतकारों ने उनकी जगह मोहम्मद रफी की आवाज को चुना. इन गीतों में कहीं शास्त्रीय संगीत की चुनौती थी तो कहीं धुन की अलग मांग. यही वजह रही कि यह दुर्लभ मेल आज भी संगीत प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
किशोर कुमार की पहचान अभिनेता और गायक दोनों रूपों में रही. वह ज्यादातर फिल्मों में अपने लिए खुद ही प्लेबैक सिंगिंग करते थे. इसके बावजूद कुछ फिल्मों में पर्दे पर उनका अभिनय नजर आया, जबकि गीत मोहम्मद रफी ने गाए. यह फैसला पूरी तरह गाने की जरूरत और संगीतकार की सोच के आधार पर लिया गया था.
किशोर कुमार ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत 1946 में फिल्म 'शिकारी' से अभिनेता के रूप में की. इसके बाद 1951 में 'आंदोलन' में वह नायक बने. गायन की शुरुआत उन्होंने कोरस से की और 1948 में फिल्म 'जिद्दी' के गीत 'मरने की दुआएं क्यों मांगूं' से बतौर प्लेबैक सिंगर पहचान बनाई. इसके बाद उन्होंने लगातार सफलता हासिल की.
फिल्म 'भागम भाग' में मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार पर फिल्माए गए तीन गीत गाए. इनमें 'चले हो कहां करके जी बेकरार', 'हमें कोई गम है, तुम्हें कोई गम है' और 'आंखों को मिला यार से' शामिल हैं. इन गीतों में रफी दा की आवाज और किशोर कुमार की अदाकारी का शानदार मेल देखने को मिला.
फिल्म 'रागिनी' का अर्ध-शास्त्रीय गीत 'मन मोरा बावरा' भी इसी सूची में शामिल है. माना जाता है कि संगीतकार ओ. पी. नैयर ने इस मुश्किल रचना के लिए मोहम्मद रफी की आवाज को ज्यादा उपयुक्त माना. वहीं फिल्म 'शरारत' के 'अजब है दास्तां तेरी ऐ जिंदगी' और 'तू मेरा कॉपीराइट, मैं तेरा कॉपीराइट' भी रफी की आवाज में रिकॉर्ड किए गए.
फिल्म 'आबरू' का गीत 'तुमको दिल दे बैठे हैं' भी उन चुनिंदा गीतों में शामिल है, जिनमें पर्दे पर किशोर कुमार दिखाई दिए और आवाज मोहम्मद रफी की रही. इन सात गीतों ने यह साबित किया कि उस दौर में कलाकार नहीं, बल्कि गीत की मांग सबसे अहम मानी जाती थी. यही वजह है कि दोनों महान गायकों का यह अनोखा संगम आज भी याद किया जाता है.