लखनऊ: लखनऊ की एक साधारण सी बस्ती में रहने वाली सारा मोइन की जिंदगी किसी चुनौतीपूर्ण सफर से कम नहीं है. न कभी उन्होंने दुनिया को अपनी आंखों से देखा, न किसी की आवाज सुनी और न ही खुद कुछ बोल पाईं. फिर भी, बारहवीं कक्षा की आईएससी बोर्ड परीक्षा में उन्होंने 98.7 प्रतिशत अंक हासिल कर न सिर्फ अपने स्कूल का टॉप किया बल्कि पूरे शहर को गर्व से भर दिया. उनकी यह उपलब्धि उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो छोटी-छोटी मुश्किलों में हिम्मत हार जाते हैं.
सारा को लोग प्यार से ‘लखनऊ की हेलेन केलर’ कहते हैं. बचपन में सारकॉइडोसिस नाम की दुर्लभ बीमारी ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया. माता-पिता मोइन अहमद इदरीसी और जूली हामिद ने कभी उन्हें कमजोर नहीं पड़ने दिया. भाई का साथ और परिवार की अटूट लगन ने सारा को आगे बढ़ने की ताकत दी. आज जब वे टॉपर बनकर सामने आई हैं तो लगता है कि सच्ची मेहनत और विश्वास किसी भी बाधा को पार कर सकता है.
सारा के माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब आई जब पुराने स्कूल ने सलाह दी कि उन्हें स्पेशल स्कूल भेज दिया जाए. लेकिन परिवार अड़ा रहा कि सारा सामान्य बच्चों के साथ ही पढ़ेगी. पिता ने अपनी सरकारी नौकरी से वीआरएस लेकर बेटी के भविष्य पर पूरा ध्यान दिया. लखनऊ के क्राइस्ट चर्च कॉलेज के प्रिंसिपल ने सारा की प्रतिभा को तुरंत पहचाना और उन्हें संस्थान में प्रवेश दे दिया. इस फैसले ने सारा के सपनों को नई उड़ान दी.
सामान्य किताबों से पढ़ना सारा के लिए संभव नहीं था. उनके शिक्षक सलमान अली काजी ने ‘ऑर्बिट रीडर’ नाम के खास डिवाइस से पढ़ाई शुरू की. हर टेक्स्टबुक को स्कैन कर वर्ड फाइल में बदला गया, जिसे डिवाइस ब्रेल में बदल देता था. सारा अपनी उंगलियों के स्पर्श से सबकुछ समझ लेती थीं. क्लास 10 में 95 प्रतिशत लाने के बाद उन्होंने 12वीं में खुद का रिकॉर्ड तोड़ दिया. ज्योग्राफी और मास मीडिया में 100-100 अंक हासिल करना उनकी मेहनत का सबूत है.
अब सारा का अगला लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा पास कर आईएएस अधिकारी बनना है. वे साबित करना चाहती हैं कि दिव्यांग व्यक्ति भी प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. उनकी कहानी सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं है बल्कि पूरे परिवार की सामूहिक जीत है. माता-पिता, भाई और स्कूल के सहयोग ने दिखाया कि सही माहौल और सही टूल्स किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकते हैं.