menu-icon
India Daily

धरती पर स्वर्ग जैसा सुख भोगते हैं ऐसे लोग, इन आदतों वाले लोग बिताते हैं नर्क जैसा जीवन

आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में इंसानी स्वभाव के उन गुणों और अवगुणों का सविस्तार वर्णन किया है जो व्यक्ति के लिए धरती पर ही स्वर्ग या नरक के अनुभवों का निर्धारण करते हैं.

KanhaiyaaZee
धरती पर स्वर्ग जैसा सुख भोगते हैं ऐसे लोग, इन आदतों वाले लोग बिताते हैं नर्क जैसा जीवन
Courtesy: AI Generated Image

ज्ञान, कूटनीति और व्यावहारिक जीवन दर्शन की जब कभी बात होती है, तो आचार्य चाणक्य का नाम सामने आ ही जाता है. उनके द्वारा रचित नीति शास्त्र आज के आधुनिक युग में भी इंसानी जीवन को सही और संतुलित दिशा दिखाने में सक्षम है. चाणक्य का मानना था कि किसी भी मनुष्य का आचरण और उसकी वाणी ही समाज में उसकी वास्तविक पहचान तय करती है. उन्होंने अपने श्लोकों के माध्यम से जीवन की उन गूढ़ बातों को समझाया है, जो व्यक्ति को मान-सम्मान दिला सकती हैं.

नीति शास्त्र के सातवें अध्याय में आचार्य चाणक्य बताते हैं कि कुछ लोग पूर्व जन्म में स्वर्ग का सुख भोगकर पृथ्वी पर आते हैं. ऐसे पुण्य आत्माओं की पहचान उनके शरीर और व्यवहार में दिखने वाले चार विशेष लक्षणों से होती है. ये लोग हमेशा मधुर वाणी बोलते हैं, मुक्त हस्त से दान-पुण्य करते हैं, ईश्वर की आराधना में लीन रहते हैं और विद्वानों व ब्राह्मणों का सत्कार करते हैं. ऐसे लोग समाज में असीम आदर पाते हैं.

नरक के दुखों को दर्शाते हैं ये अवगुण

इसके विपरीत, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लक्षण यह दर्शाते हैं कि वे नरक के कष्ट झेलकर धरती पर आए हैं. चाणक्य के अनुसार, अत्यधिक क्रोध करना, अत्यंत कड़वी भाषा का प्रयोग करना, दरिद्रता में जीवन बिताना और अपने ही परिजनों से शत्रुता रखना इसके मुख्य संकेत हैं. इसके साथ ही गलत चरित्र के लोगों की संगति करना और नीच लोगों की सेवा करने वाले मनुष्य लोक और परलोक दोनों जगह दुखी रहते हैं.

घर में ही स्वर्ग का वास

चाणक्य ने पारिवारिक परिवेश को लेकर भी एक बेहद सुंदर बात कही है. उनके अनुसार, जिस घर में माता को साक्षात लक्ष्मी और पिता को भगवान जनार्दन (विष्णु) के समान आदर प्राप्त होता है, वह स्थान साक्षात वैकुंठ बन जाता है. यदि परिवार के अन्य सदस्य और सगे-संबंधी भी ईश्वर भक्त और आपस में प्रेम रखने वाले हों, तो उस व्यक्ति के लिए अपना गृह राज्य ही तीनों लोकों के सुख के बराबर हो जाता है.

विनाश की ओर ले जाने वाली ईर्ष्या

नीति शास्त्र के दसवें अध्याय में आचार्य चाणक्य मनुष्य को आत्म-द्वेष और ईर्ष्या के प्रति सचेत करते हैं. वे कहते हैं कि जो व्यक्ति स्वयं से घृणा करता है, उसका अंत समय से पूर्व तय है. दूसरों की संपत्ति और खुशहाली से जलने वाले लोगों का धन धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है. राजा या प्रशासनिक व्यवस्था से बैर रखने वाले का संपूर्ण विनाश हो जाता है और विद्वानों से शत्रुता रखने वाले का कुल नष्ट हो जाता है.

चाणक्य के विचारों की प्रासंगिकता

आचार्य चाणक्य के ये व्यावहारिक सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि हमारे कर्म ही हमारे जीवन को सुखी या दुखी बनाते हैं. यदि हम अपनी वाणी में मधुरता रखें, दूसरों के प्रति ईर्ष्या का भाव त्याग दें और अपने परिवार में आपसी सामंजस्य बनाए रखें, तो जीवन की राह बेहद आसान हो जाती है. चाणक्य नीति के ये सूत्र आज भी हर वर्ग के व्यक्ति के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं.