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लगातार 8वीं बार नहीं बदला Repo Rate, समझिए जनता का फायदा है या नुकसान

Repo Rate: RBI ने ऐलान किया है कि इस बार भी रेपो रेट नहीं बदलेगा. यानी लगातार 8वीं बार भी रेपो रेट में बदलाव नहीं किया जाएगा और यह 6.5 पर्सेंट पर ही बना रहेगा.

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लगातार 8वीं बार नहीं बदला Repo Rate, समझिए जनता का फायदा है या नुकसान
Courtesy: ANI

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने ऐलान किया है कि इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है. यानी लगातार आठवीं बार बिना बदलाव हुए रेपो रेट 6.5 पर्सेंट पर ही रहेगा. रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक बाकी कमर्शियल बैंकों को लोन देता है. बदलाव न होने का मतलब है कि RBI से लोने लेने वाले बैंकों को उतनी ही दर पर लोन मिलता रहेगा जितने पर पहले मिल रहा था. साथ ही, उनकी EMI में भी कोई बदलाव नहीं पड़ेगा. इसका असर यह होगा कि आम जनता पर भी बोझ नहीं पड़ेगा और ज्यादातर चीजें पहले की तरह ही तुलना में चलती रहेंगी. अक्सर देखा जाता है कि रेपो रेट में बदलाव के साथ बैंक अपने ग्राहकों के लिए भी लोन की दरों में बदलाव कर देते हैं.

RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा, 'मौजूदा वित्त वर्ष 2024-25 के लिए वास्तविक जीडीपी ग्रोथ 7.2 पर्सेंट है. पहले क्वार्टर में यह 7.3 पर्सेंट, दूसरे में 7.2 पर्सेंट, तीसरे में 7.3 पर्सेंट और चौथे में 7.2 पर्सेंट रहने का अनुमान है. इस तरह रिस्क का संतुलन कर लिया गया है.' उन्होंने यह भी बताया कि मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने 4:2 के बहुमत से यह फैसला लिया है कि रेपो रेट में बदलाव नहीं किया जाएगा और वह 6.5 पर्सेंट पर बना रहेगा.

विदेशी मुद्रा कोष तोड़ रहा रिकॉर्ड

इसी के साथ स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट 6.25 पर्सेंट और मार्जिनकल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट 6.75 पर्सेंट पर बरकरार रहेगा. मुंबई में चल रही मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक खत्म होने के बाद बताया गया कि अप्रैल 2024 में रिटेल महंगाई 11 महीने के न्यूनतम स्तर यानी 4.83 पर्सेंट पहुंच गई थी. आरबीआई की ओर से यह भी बताया गया कि 31 मई तक देश का विदेशी मुद्रा कोष 651.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया जो कि अपने आप में ऐतिहासिक है.

कितना असर डालता है रेपो रेट?

आप जिन बैंकों से लोन लेते हैं, अक्सर वे बैंक आरबीआई से लोन लेते हैं. इसी लोन की ब्याज दर को रेपो रेट कहते हैं. अब 6.5 पर्सेंट रेपो रेट का मतलब है कि अगर कोई बैंक आरबीआई से लोन लेता है तो उसे 6.5 पर्सेंट की दर से ब्याज चुकाना होगा. अब बैंक को अगर ब्याज देना पड़ेगा तो यह स्पष्ट है कि वह इसकी वसूली अपने ग्राहकों से ही करेगा. इसके लिए बैंक अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले लोन पर ब्याज का प्रतिशत बढ़ा देते हैं. सीधा-सीधा फंडा है कि अगर रेपो रेट ज्यादा होगा और बैंकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा तो वे इसके बदले में अपने ग्राहकों को जो लोन देंगे उसकी ब्याज दर बढ़ा देंगे.

यानी अगर रेपो रेट बढ़ा तो लोन महंगा होगा. लोन महंगा होगा तो लोग खर्च कम कर देंगे. ऐसे में कई काम रुकने लगते हैं, कैश फ्लो कम होता है और शेयर मार्केट में भी डाउनफॉल होने लगता है. नतीजा यह होता है कि महंगाई भी बढ़ जाती है. ऐसे में जब आरबीआई को कैश फ्लो बढ़ाना होता है तो रेपो रेट को कम कर देता है जिससे कैश फ्लो बढ़ जाए और लोग जमकर खर्च कर सकें.