उत्तर प्रदेश: केंद्र सरकार के नमामि गंगे कार्यक्रम ने गंगा नदी को स्वच्छ बनाने में अच्छी सफलता हासिल की है. वर्ष 2017 की तुलना में गंगा में पहुंचने वाला औद्योगिक प्रदूषण अब करीब 60 प्रतिशत कम हो गया है. यह जानकारी कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों ने दी है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार गंगा प्रदूषण प्रभावित उद्योगों (GPI) से निकलने वाला जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) भार 2017 में 26 टन प्रतिदिन था, जो अब घटकर 10.75 टन प्रतिदिन रह गया है. इस उल्लेखनीय सुधार के पीछे सख्त निगरानी, अपशिष्ट उपचार संयंत्रों की स्थापना और उद्योगों पर बढ़ाई गई जवाबदेही है.
कानपुर का जाजमऊ टेनरी इलाका लंबे समय से गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था. यहां से निकलने वाला रंग-बिरंगा और जहरीला पानी सीधे गंगा में गिरता था. अब स्थिति काफी बेहतर हुई है. दिसंबर 2023 में यहां 20 मिलियन लीटर प्रतिदिन (MLD) क्षमता का कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) शुरू किया गया.
यह प्लांट अब पूरी क्षमता से चल रहा है. यह टेनरियों से निकलने वाले क्रोमियम, कार्बनिक अपशिष्ट और रंगों वाले रसायनों को साफ करता है. साथ ही सिसामऊ नाले को भी इंटरसेप्ट कर लिया गया है. पहले यह नाला रोजाना करीब 140 MLD बिना उपचारित गंदा पानी गंगा में बहा रहा था. अब इसे रोका जा रहा है और उपचारित किया जा रहा है.
इन प्रयासों से कानपुर में गंगा की जल गुणवत्ता में साफ सुधार दिख रहा है. हालांकि कुछ चुनौतियां अभी भी बाकी हैं. अधिकारियों का कहना है कि पूरी तरह स्वच्छ गंगा के लिए और काम करने की जरूरत है.
कानपुर के अलावा मथुरा और उन्नाव में भी नमामि गंगे के तहत बड़े प्रोजेक्ट चल रहे हैं. इन शहरों में नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं और पुराने प्लांटों को अपग्रेड किया जा रहा है. लेदर इंडस्ट्री (चमड़े के कारखानों) में अब हर उद्योग के लिए अपना ट्रीटमेंट प्लांट लगाना अनिवार्य कर दिया गया है. जो उद्योग नियमों का पालन नहीं करते, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है.
नमामि गंगे कार्यक्रम वर्ष 2014 में शुरू हुआ था. इसका मुख्य लक्ष्य गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाना, सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट को रोकना तथा नदी किनारे की पारिस्थितिकी को बहाल करना है. अब तक सैकड़ों सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, घाटों का विकास और नदी साफ करने के काम हो चुके हैं.