Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर देश कारगिल युद्ध के वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दे रहा है. इन्हीं वीरों में परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम आज भी देशवासियों के दिलों में जिंदा है. कारगिल युद्ध में उनके अदम्य साहस और बलिदान ने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया. उनके पिता गिरधारी लाल बत्रा का मानना है कि कारगिल युद्ध का विस्तृत इतिहास स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी देशभक्ति और वीरता से प्रेरणा ले सके.
कैप्टन विक्रम बत्रा को कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने 'शेरशाह' का कोड नाम दिया था. उन्होंने प्वाइंट 5140 पर जीत हासिल कर भारतीय सेना की बड़ी सफलता में अहम भूमिका निभाई. इसके बाद 7 जुलाई 1999 को प्वाइंट 4875 पर दुश्मनों से लड़ते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया. उनकी असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
विक्रम बत्रा की वीरगाथा आज भी देश और विदेश के लोगों को प्रेरित कर रही है. उनके पिता बताते हैं कि उन्हें आज भी कई पत्र मिलते हैं, जिनमें लोग लिखते हैं कि कैप्टन बत्रा उनके आदर्श हैं. एक युवक ने बताया कि वह अपने बटुए में विक्रम बत्रा की तस्वीर रखता है और जब भी जीवन में निराश होता है, उस तस्वीर को देखकर उसे नई ऊर्जा और हिम्मत मिलती है. वहीं अमेरिका में रहने वाली एक महिला ने अपने बेटे का नाम विक्रम रखा, ताकि वह बड़ा होकर कैप्टन बत्रा जैसा साहसी और देशभक्त बने.
गिरधारी लाल बत्रा ने उस पल को भी याद किया जब प्वाइंट 5140 पर जीत के बाद उनके बेटे का फोन आया था. उन्होंने कहा कि विक्रम ने फोन पर कहा था, 'डैडी, हमने प्वाइंट 5140 दोबारा हासिल कर लिया है. आप चिंता मत कीजिए.' यह सुनकर पूरा परिवार गर्व से भर उठा. इसी अभियान के बाद उनका प्रसिद्ध नारा 'ये दिल मांगे मोर' पूरे देश में साहस और विजय का प्रतीक बन गया.
पिता के अनुसार विक्रम बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे. उन्हें भगत सिंह, छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोबिंद सिंह जैसे महान वीरों की कहानियां सुनना बेहद पसंद था. केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान सैन्य अधिकारियों के बच्चों के संपर्क में आने से उनमें सेना के प्रति आकर्षण और बढ़ गया. उन्होंने सेना में अधिकारी बनकर अपने पिता का सपना भी पूरा किया.
गिरधारी लाल बत्रा का कहना है कि कारगिल युद्ध दुनिया की सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक था. इसलिए इसकी वीरगाथाओं और भारतीय सैनिकों के बलिदान को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. वहीं डीएवी कॉलेज के वार मेमोरियल में कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम आज भी छात्रों को प्रेरित करता है. उनकी वीरता से प्रेरणा लेकर 100 से अधिक छात्र सैन्य सेवाओं में अधिकारी बन चुके हैं.