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2019 से बिना टीचर चल रहा स्कूल... झारखंड के संस्कृत स्कूलों में न शिक्षक, न छात्र, सिर्फ जर्जर इमारत

झारखंड के राजकीय संस्कृत विद्यालय और महाविद्यालय लंबे समय से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं. पलामू का राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय वर्ष 2019 से बिना शिक्षक और छात्रों के है.

Meenu Singh
Edited By: Meenu Singh
2019 से बिना टीचर चल रहा स्कूल...  झारखंड के संस्कृत स्कूलों में न शिक्षक, न छात्र, सिर्फ जर्जर इमारत
Courtesy: AI

संस्कृत को भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भाषा माना जाता है, लेकिन झारखंड में इसकी शिक्षा व्यवस्था गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है. पलामू के मेदिनीनगर स्थित राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय की स्थिति इस संकट की सबसे बड़ी मिसाल बन गई है. यहां वर्षों से नियमित पढ़ाई नहीं हो रही है. शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन और खाली कक्षाएं यह संकेत दे रही हैं कि संस्कृत शिक्षा को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

2019 से बंद है नियमित पढ़ाई

मेदिनीनगर का प्रमंडलीय राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालय वर्ष 2019 से शिक्षक और छात्र दोनों के बिना चल रहा है. विद्यालय के एकमात्र शिक्षक के पदोन्नत होने के बाद नई नियुक्ति नहीं हुई. वर्तमान में केवल एक लिपिक और एक अनुसेवक विद्यालय की औपचारिक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं. नियमित शिक्षण कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है.

जर्जर भवन बना चिंता का कारण

विद्यालय की इमारत भी गंभीर स्थिति में पहुंच चुकी है. भवन की छत और दीवारें काफी कमजोर हो गई हैं. कर्मचारियों को हर दिन इस आशंका के बीच काम करना पड़ता है कि कहीं कोई हिस्सा गिर न जाए. ऐसे माहौल में पढ़ाई शुरू करना भी चुनौती बना हुआ है.

पूरे राज्य में शिक्षकों की कमी

जानकारी के अनुसार झारखंड के छह राजकीय संस्कृत उच्च विद्यालयों में शिक्षकों का अभाव है. देवघर, धनबाद, रांची, पश्चिम सिंहभूम, हजारीबाग और पलामू के विद्यालय नई नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं. वर्ष 1994 के बाद संस्कृत शिक्षकों की भर्ती नहीं होने से स्थिति लगातार बिगड़ती गई है.

महाविद्यालय की हालत भी चिंताजनक

पलामू का संस्कृत महाविद्यालय भी वर्षों से स्थायी प्राचार्य और शिक्षकों के बिना संचालित हो रहा है. पहले अतिथि शिक्षकों के सहारे पढ़ाई चलती रही, लेकिन अब वहां भी नियमित शिक्षक नहीं हैं. सीमित कर्मचारियों के भरोसे प्रशासनिक कार्य पूरे किए जा रहे हैं.

संस्कृत शिक्षा के भविष्य पर सवाल

हैरानी की बात यह है कि शिक्षक नहीं होने के बावजूद हर वर्ष विद्यार्थियों का नामांकन होता है और परीक्षाएं भी आयोजित की जाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द नियुक्तियां और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, तो संस्कृत शिक्षा का दायरा और सीमित होता जाएगा. सरकार के सामने इस व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की बड़ी चुनौती खड़ी है.