चंडीगढ़: सरकारी भर्तियों में लोक सेवा आयोग की भूमिका को लेकर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया के दौरान लोक सेवा आयोग न तो उम्मीदवार के अनुभव की जांच कर सकता है और न ही दस्तावेजों की वैधता पर फैसला ले सकता है. यह अधिकार केवल नियुक्ति करने वाले विभाग को है. यह फैसला न केवल एक उम्मीदवार को राहत देता है, बल्कि भर्ती प्रक्रियाओं की सीमाएं भी तय करता है.
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि आयोग ने अपने संवैधानिक और वैधानिक दायरे से बाहर जाकर कार्य किया. न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ ने स्पष्ट कहा कि चयन और सिफारिश तक सीमित भूमिका वाले आयोग को अनुभव सत्यापन या दस्तावेजों की जांच का अधिकार नहीं है.
यह विवाद 2018 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसमें HSIIDC में मैनेजर (यूटिलिटी) के सात पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे. उम्मीदवार प्रसून शर्मा ने निजी कंपनी और राज्य के सिंचाई विभाग में अपने अनुभव के आधार पर आवेदन किया. उन्होंने लिखित परीक्षा पास की और शुरुआती जांच में कोई आपत्ति नहीं उठी.
लिखित परीक्षा के बाद आयोग ने अचानक बैंक स्टेटमेंट, ईपीएफ, ईएसआई और टैक्स रिकॉर्ड जैसे दस्तावेज मांगे, जिनका जिक्र मूल विज्ञापन में नहीं था. उम्मीदवार ने वैकल्पिक प्रमाण दिए और बताया कि निजी कंपनी पर ये नियम लागू नहीं होते, फिर भी आयोग ने उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी.
अदालत ने रिकॉर्ड किया कि HSIIDC ने पहले ही एक समिति बनाकर उम्मीदवार के दस्तावेजों को सही पाया था. इसके बावजूद आयोग ने हस्तक्षेप किया, जो संस्थागत संतुलन के खिलाफ है. कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति और सत्यापन का अंतिम अधिकार नियोक्ता विभाग के पास ही रहता है.
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले जतिंदर कुमार बनाम पंजाब राज्य (1985) का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक सेवा आयोग की सिफारिशें केवल परामर्शात्मक होती हैं. सरकार ही अंतिम रूप से यह तय करती है कि कौन उम्मीदवार नियुक्ति के योग्य है.
कोर्ट ने HSIIDC को निर्देश दिया कि वह प्रसून शर्मा की नियुक्ति पर विचार करे और उन्हें बैच के अन्य उम्मीदवारों के साथ नाममात्र के लाभ दे. साथ ही, आदेश की प्रति हरियाणा के मुख्य सचिव को भेजी गई है ताकि भविष्य में इस तरह की संस्थागत अति से बचा जा सके.