धूप से प्रोटेक्शन के लिए सनस्क्रीन बेहद जरूरी है. हर किसी को अपने रोजमर्रा के जीवन में सनस्क्री इस्तेमाल करना चाहिए. हालांकि कई लोगों का मानना होता है कि सनस्क्रीन केवल बाहर निकलते समय ही लगाना जरूरी होता है. लेकिन हम आपको बताएंगे कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
सूरज से आने वाली रौशनी में अल्ट्रावॉयलेट किरणें तीन प्रकार की होती हैं. जिसमें UVC, UVB और UVA किरणे होती हैं.
UVC किरणें सबसे खतरनाक हैं, लेकिन वायुमंडल उन्हें रोक लेता है. UVB किरणें सनबर्न और स्किन कैंसर का कारण बनती हैं, पर ये कांच की खिड़की से अंदर नहीं आ पातीं. सबसे चिंताजनक UVA किरणें हैं. ये त्वचा पर पिगमेंटेशन, मेलास्मा, समय से पहले बुढ़ापा और महीन रेखाएं पैदा करती हैं. खास बात यह है कि UVA किरणें काँच को पार कर अंदर तक पहुंच जाती हैं.
एक्सपर्ट मानते हैं कि खिड़कियों वाली अच्छी रोशनी वाले कमरों में या सूरज की प्राकृतिक रोशनी आने वाली जगह पर लंबे समय तक बैठने वाले लोगों को UVA किरणों का खतरा बना रहता है. इससे त्वचा पर धीरे-धीरे नुकसान होता है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.
आजकल लोग ज़्यादातर समय मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर स्क्रीन्स के सामने बिताते हैं. इस वजह से ब्लू लाइट का संपर्क भी बढ़ गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्लू लाइट ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा कर पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है, खासकर गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में इसका खतरा रहता है. जिन लोगों को पिगमेंटेशन की समस्या पहले से है, उन्हें ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना चाहिए.
एक्सपर्ट का कहना है कि स्किन केयर केवल अच्छा दिखने के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ्य रहने के लिए भी जरूरी है. उनका मानना है कि जो लोग दिन भर में कई बार बाहर आते जाते हैं, उन्हें दोबारा सनस्क्रीन लगाया चाहिए. वहीं जो पूरे दिन घर या ऑफिस में रहते हैं, उन्हें इसकी जरूरत नहीं होती है. साथ ही अपने स्किन के हिसाब से ही सनस्क्रीन चुनने की सलाह दी जाती है. बाहर निकलने वाले लोगों को हर तीन से चार घंटे पर सनस्क्रीन लगाने की सलाह दी जाती है. वहीं स्क्रीन टाइम ज्यादा होने पर एंटी-ऑक्सीडेंट युक्त सनस्क्रीन लगाने के लिए कहा जाता है. हालांकि कोई भी सनस्क्रीन इस्तेमाल करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है.