जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की पहाड़ियों के बीच बसा धदकई गांव अपनी खूबसूरती के साथ एक अनोखी पहचान भी रखता है. इस गांव को ‘भारत का साइलेंट विलेज’ कहा जाता है. इसकी वजह यहां का प्राकृतिक सन्नाटा नहीं, बल्कि गांव में रहने वाले बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो जन्म से न सुन सकते हैं और न ही बोल सकते हैं. करीब 2,000 की आबादी वाले इस गांव में 90 से अधिक मूक-बधिर लोग रहते हैं. वर्षों से यह स्थिति वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए भी अध्ययन का विषय रही है. शोध के बाद इसके पीछे अनुवांशिक कारण सामने आए हैं. वहीं गांव के लोगों ने संवाद के लिए अपनी अलग सांकेतिक भाषा भी विकसित कर ली है.
धदकई गांव जम्मू से लगभग 260 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां मुख्य रूप से अनुसूचित जनजाति के गुज्जर मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. गांव के 105 परिवारों में से 55 से अधिक परिवार ऐसे हैं, जहां कम से कम एक सदस्य मूक-बधिर है. कुछ परिवारों में तो सात बच्चों में से छह बच्चे भी इसी स्थिति के साथ पैदा हुए हैं.
धदकई की सबसे खास बात यह है कि यहां के लोगों ने अपनी स्थानीय सांकेतिक भाषा विकसित कर ली है. जो लोग सुन और बोल सकते हैं, वे भी इसी भाषा का सहज रूप से इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि गांव में रोजमर्रा का जीवन बिना किसी बड़ी परेशानी के चलता रहता है और संवाद का माध्यम इशारे बन चुके हैं.
गांव के बुजुर्गों और उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, यहां पहला मूक-बधिर बच्चे का जन्म वर्ष 1901 में दर्ज किया गया था. इसके बाद ऐसे मामलों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई. वर्ष 1990 में गांव में 43 मूक-बधिर लोग थे, जबकि 2007 तक यह संख्या 79 पहुंच गई. वर्तमान में यह आंकड़ा 90 से अधिक बताया जाता है.
लंबे समय तक लोग इसे किस्मत, पानी या किसी अन्य कारण से जोड़ते रहे. लेकिन वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के अध्ययन में पता चला कि इसके पीछे अनुवांशिक कारण हैं. शोध के दौरान ग्रामीणों के रक्त नमूनों में OTOF जीन में गड़बड़ी पाई गई. यही जीन कान से मस्तिष्क तक ध्वनि संकेत पहुंचाने का काम करता है. इसमें दोष होने पर बच्चा जन्म से मूक-बधिर हो सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय से सीमित समुदाय और करीबी रिश्तों में विवाह होने के कारण यह अनुवांशिक समस्या बढ़ी है. इसे मेडिकल साइंस में 'जेनेटिक क्लस्टर' या 'फाउंडर्स इफेक्ट' कहा जाता है. डॉक्टरों ने समुदाय के बाहर विवाह को इस समस्या को कम करने का एक उपाय बताया है. साथ ही विवाह से पहले जेनेटिक जोखिम का आकलन करने के लिए कलर-कोडेड कार्ड जैसी व्यवस्था का सुझाव भी दिया गया है. हाल के वर्षों में भारतीय सेना और कुछ सामाजिक संस्थाएं यहां के युवाओं को इंडियन साइन लैंग्वेज सिखाने और मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं.