नई दिल्ली: ईरान में व्यापक विरोध प्रदर्शनों और सरकारी कार्रवाई के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में एक बार फिर तनाव देखने को मिल रहा है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को यह संकेत दिया है कि उनका सैन्य कार्रवाई का इरादा नहीं है. ईरान के पाकिस्तान स्थित राजदूत ने यह जानकारी साझा की है. हालांकि, ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया है कि अमेरिका स्थिति पर करीबी नजर रखेगा और आगे का कदम हालात के आधार पर तय होगा.
ईरान के पाकिस्तान में राजदूत रजा अमीरी मोघदम के अनुसार, उन्हें बुधवार तड़के करीब एक बजे यह सूचना मिली कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध नहीं चाहते. उन्होंने ईरान से क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना न बनाने और संयम बरतने का आग्रह किया है. यह संदेश ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच बयानबाजी और कूटनीतिक तनाव तेज बना हुआ है.
ईरानी राजदूत ने यह भी कहा कि उनके देश के नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध करने का वैध अधिकार है. उनके मुताबिक सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत भी की है. हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ सशस्त्र समूह हिंसा फैला रहे हैं और मस्जिदों पर हमले तथा हत्याओं जैसी घटनाओं में शामिल हैं. ईरानी प्रशासन इन घटनाओं को कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बता रहा है.
बुधवार तक अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि यदि ईरान में प्रदर्शनकारियों को मृत्युदंड दिया गया तो सैन्य कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है. इसके बाद व्हाइट हाउस में बयान देते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्हें भरोसेमंद सूत्रों से जानकारी मिली है कि फांसी की सज़ाएं रोकी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि कथित तौर पर होने वाली कई फांसियों को फिलहाल टाल दिया गया है.
ओवल ऑफिस में पूछे गए एक सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई फिलहाल पूरी तरह खारिज नहीं की गई है. उन्होंने कहा कि अमेरिका प्रक्रिया पर नजर रखेगा और देखेगा कि आगे क्या होता है. इस बयान से यह स्पष्ट है कि वाशिंगटन अभी सतर्क रुख अपनाए हुए है और किसी भी फैसले से पहले हालात का आकलन कर रहा है.
ईरान में विरोध प्रदर्शन शुरुआत में आर्थिक मुद्दों को लेकर शुरू हुए थे, लेकिन जल्द ही यह एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गए. मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि सरकारी कार्रवाई में अब तक कम से कम 3,428 लोगों की मौत हो चुकी है. इन संगठनों ने इंटरनेट बंद कर हिंसा छिपाने के आरोप भी लगाए हैं. यह आंदोलन 1979 के बाद से ईरानी सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है.