नेपाल में 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ को लेकर हाईरिस्क की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जिस इलाके में यह आपदा आई, वहां उपग्रह तस्वीरों में पहले ही हिमस्खलन के संकेत दिखाई नजर आने लगे थे. ग्लेशियर के ढहने से पहले उसकी सतह पर दरारें भी नजर आ चुकी थीं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाके में चेतावनी देने वाली कुछ व्यवस्थाएं हाल में लगाई गई थीं, लेकिन उनका मुख्य ध्यान चीन की ग्लेशियर झीलों से जुड़े खतरों पर था. ग्लेशियर से सीधे जुड़े खतरों की निगरानी और चेतावनी के लिए वहां प्रभावी व्यवस्था मौजूद नहीं थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, शुरुआती हिमस्खलन जिस तेजी से आगे बढ़ा, उसे देखते हुए नदी के भीतर लगाए गए सामान्य चेतावनी तंत्र से लोगों को बहुत कम समय मिल पाता. ऐसे में रासुवागढ़ी स्थित नेपाल-चीन सीमा चौकी पर मौजूद लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना बेहद मुश्किल होता. हालांकि, बाढ़ के आगे के इलाकों में स्थिति अलग हो सकती थी. वहां कुछ जगहों पर 10 मिनट या उससे अधिक समय की चेतावनी संभव थी. रिपोर्ट का मानना है कि व्यापक और बेहतर क्षमता वाली चेतावनी व्यवस्था इन क्षेत्रों में कई लोगों की जान बचा सकती थी.
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है. इस बड़े पैमाने की प्राकृतिक हलचल के दौरान 4 से अधिक तीव्रता का भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ. इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की समय रहते पहचान के लिए भूकंपीय निगरानी तंत्र के इस्तेमाल की संभावना बढ़ती है. विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे संकेतों को चेतावनी व्यवस्था से जोड़कर खतरनाक इलाकों में रहने वाले लोगों को पहले ही सतर्क किया जा सकता है.
नेपाल के अधिकारियों के अनुसार, आपदा में मरने वालों की संख्या 1,050 से अधिक हो गई है. सुरक्षा बलों ने आठ जिलों से और शव बरामद किए हैं. राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक करीब 4,000 लोग अभी भी लापता हैं, जबकि लगभग 12,000 लोगों को बचाया जा चुका है. अचानक आई बाढ़ का असर नेपाल में रह रहे और वहां यात्रा कर रहे विदेशी नागरिकों पर भी पड़ा है. भारत ने अपने 163 नागरिकों को प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला है. भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, नेपाली अधिकारियों के साथ मिलकर राहत और बचाव अभियान जारी है.