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पाकिस्तान में कई पत्रकारों और यूट्यूबरों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा, जानें क्यों

उम्रकैद की सजा पाने वाले पत्रकार सबीर शाकिर ने इस फैसले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है. उनका कहना है कि यह फैसला स्वतंत्र आवाजों को दबाने की कोशिश है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
पाकिस्तान में कई पत्रकारों और यूट्यूबरों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा, जानें क्यों
Courtesy: pinterest

पाकिस्तान में मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों पर बड़ी कार्रवाई सामने आई है. शुक्रवार, 2 जनवरी को एक आतंकवाद-रोधी अदालत ने तीन पत्रकारों, दो यूट्यूबरों और दो रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. इन सभी को साल 2023 में हुए दंगों के दौरान हिंसा भड़काने और सरकारी संस्थानों के खिलाफ नफरत फैलाने का दोषी माना गया है.

 गैर-मौजूदगी में चला मुकदमा

इस मामले की खास बात यह रही कि सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा उनकी गैर-मौजूदगी में चलाया गया. सजा सुनाते समय भी कोई अभियुक्त अदालत में मौजूद नहीं था. बताया गया है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए ये सभी लोग फिलहाल पाकिस्तान से बाहर रह रहे हैं. अदालत ने उपलब्ध सबूतों और जांच रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला सुनाया.

 किन लोगों को मिली सजा

उम्रकैद की सजा पाने वालों में पूर्व संपादक शाहीन सहबाई, वरिष्ठ पत्रकार सबीर शाकिर और मोईद पीरजादा शामिल हैं. इसके अलावा यूट्यूबर वजाहत सईद खान और हैदर रजा मेहदी को भी दोषी ठहराया गया है. साथ ही रिटायर्ड सैन्य अधिकारी आदिल रजा और अकबर हुसैन को भी इस मामले में उम्रकैद की सजा दी गई है.

9 मई 2023 की हिंसा से जुड़ा मामला

इन सभी के खिलाफ मामले 9 मई 2023 को हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बाद दर्ज किए गए थे. उस दिन पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थकों ने कई सैन्य और सरकारी संस्थानों पर हमला किया था. इसके बाद सरकार और सेना ने इमरान खान की पार्टी और उनके समर्थकों के साथ-साथ आलोचकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की थी.

 सैकड़ों लोगों पर दर्ज हुए केस

9 मई की घटनाओं के बाद पाकिस्तान में सैकड़ों लोगों पर हिंसा भड़काने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए. इन मामलों में आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल किया गया. पत्रकारों और यूट्यूबरों पर भी इसी कानून के तहत मुकदमे चलाए गए.

 फैसले पर उठे सवाल

उम्रकैद की सजा पाने वाले पत्रकार सबीर शाकिर ने इस फैसले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है. उनका कहना है कि यह फैसला स्वतंत्र आवाजों को दबाने की कोशिश है. इस फैसले के बाद पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है.