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India Daily

दूध पीने की उम्र में बच्चे चला रहे AK47, ग्रेनेड से कर रहे अटैक, पुतिन की अगली पीढ़ी की मिलिट्री का वीडियो देगा हिला

दक्षिणी रूस के रोस्तोव क्षेत्र में डॉन नदी के किनारे आयोजित एक विशेष कैंप में दर्जनों बच्चों ने सेना जैसी ट्रेनिंग में हिस्सा लिया. 8 से 17 साल तक के बच्चों ने सैनिकों की देखरेख में रूट मार्च किया, रेंगते हुए बाधाओं को पार किया और यहां तक कि नकली हथियारों से फायरिंग और ग्रेनेड फेंकने की प्रैक्टिस भी की. रूसी अधिकारियों का कहना है कि यह बच्चों में देशभक्ति और अनुशासन की भावना जगाने के लिए है, जबकि आलोचकों का आरोप है कि यह बच्चों को युद्ध के लिए तैयार करने का तरीका है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
दूध पीने की उम्र में बच्चे चला रहे AK47, ग्रेनेड से कर रहे अटैक, पुतिन की अगली पीढ़ी की मिलिट्री का वीडियो देगा हिला
Courtesy: WEB

आमतौर पर छुट्टियों के कैंप बच्चों के लिए मस्ती और एडवेंचर का जरिया होते हैं, लेकिन रूस में इस हफ्ते आयोजित एक कैंप बिल्कुल अलग था. डॉन नदी के किनारे बने इस कैंप में बच्चों को खेल-खेल में नहीं बल्कि सैनिकों की तरह अनुशासन और प्रशिक्षण सिखाया गया. फौजी अंदाज में दी गई यह ट्रेनिंग बच्चों के लिए रोमांचक तो रही, लेकिन इसके पीछे छिपे संदेश को लेकर बहस भी छिड़ गई है.

कैंप में 8 से 17 साल के बीच की उम्र बीच वाले 83 बच्चे शामिल हुए. जो फौजी अंदाज में दौड़ते और रेंगते नजर आए. किसी ने कैमोफ्लॉज यूनिफॉर्म पहना था तो किसी के हाथ में असली हथियार या फिर उसका खिलौना रूप था. उन्हें shallow पानी और रेत पर रेंगते हुए बाधाओं को पार करना पड़ा. ट्रेनिंग दे रहे सैन्यकर्मी वही सैनिक थे जिन्होंने यूक्रेन युद्ध में हिस्सा लिया है.

ट्रेनिंग को लेकर बच्चों ने क्या कहा?

सबसे छोटे प्रतिभागी 8 वर्षीय इवान ग्लुशचेंको ने बताया कि उसके लिए सबसे यादगार पल नकली गोलियां चलाना और ग्रेनेड फेंकना था. वहीं एक बड़े कैडेट एंटन ने कहा कि वह अपना भविष्य सेना के साथ जोड़ना चाहता है और देश की सेवा करना चाहता है. एक अन्य किशोर डेविड ने कहा कि इस प्रशिक्षण ने उसकी इच्छाशक्ति को परखने का मौका दिया और उसने खुद की मजबूती को महसूस किया.

बच्चों की ट्रेनिंग पर हो रहा विवाद

बच्चों को इस तरह की ट्रेनिंग दिलाने पर आलोचक संगठनों ने सवाल खड़े किए हैं. स्वतंत्र बच्चों के अधिकार संगठन 'ने नॉरमा' का कहना है कि यह बच्चों को युद्ध की मानसिकता से जोड़ने और उन्हें प्रचार का हिस्सा बनाने जैसा है. संगठन के अनुसार इतनी कम उम्र में हथियारों की ट्रेनिंग बच्चों के मानसिक विकास पर असर डाल सकती है. हालांकि रूसी प्रशासन का दावा है कि इस तरह की गतिविधियां बच्चों में देशभक्ति की भावना, अनुशासन और एकजुटता पैदा करती हैं.

सैनिकों और प्रशिक्षकों का क्या है नजरिया?

इस प्रशिक्षण में शामिल एक प्रशिक्षक अलेक्जेंडर शोपिन खुद यूक्रेन युद्ध में घायल हुए सैनिक हैं और सर्जरी का इंतजार कर रहे हैं. उनकी बेटी भी इस कैंप का हिस्सा बनी. शोपिन ने कहा कि उन्हें बच्चों को अपना अनुभव बांटने में खुशी मिलती है और यह देखना अच्छा लगता है कि कैसे बच्चे एक टीम की तरह काम करना सीखते हैं. वहीं एक अन्य प्रशिक्षक व्लादिमीर यानेन्को ने कहा कि यह ट्रेनिंग बच्चों को न केवल मज़बूत बनाती है बल्कि उन्हें सिखाती है कि जीवन में अनुशासन और देशप्रेम कितना जरूरी है.