नई दिल्ली: मिडिल-ईस्ट एक बार फिर दुनिया की चिंता का केंद्र बन गया है. ईरान, लेबनान और हिजबुल्लाह को लेकर अमेरिका और इजराइल के बीच रणनीतिक मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं. यूएस-ईरान सीजफायर की संभावनाओं के बीच दोनों देशों के नेताओं, डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू, की प्राथमिकताएं अलग-अलग दिशाओं में जा रही हैं, जिससे मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की कोशिशें और जटिल हो गई हैं.
शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू मध्य पूर्व संकट पर एक ही रणनीति पर चल रहे हैं. लेकिन जैसे-जैसे लेबनान और ईरान में घटनाएं तेज हुईं, दोनों देशों के हित अलग होते दिखे. ट्रंप ने इजराइल को बेरूत पर हमले न करने की चेतावनी दी थी, लेकिन इजराइल ने इसकी परवाह किए बिना हमला कर दिया. इस घटना ने दोनों के बीच की दूरी को सबके सामने उजागर कर दिया.
इजराइल के उस हमले के जवाब में ईरान ने पहली बार इस संघर्ष-काल में बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. इजराइल ने भी पलटवार किया, और यह तब हुआ जब वॉशिंगटन, तेहरान के साथ नाजुक शांति वार्ता में जुटा था. इस घटना ने अमेरिका की कूटनीतिक कोशिशों को गहरा झटका दिया.
ईरान की साफ मांग है कि किसी भी व्यापक क्षेत्रीय समझौते के लिए लेबनान में सभी हमले बंद होने चाहिए. दूसरी तरफ इजराइल का तर्क है कि जब तक हिजबुल्लाह का पूरी तरह खात्मा नहीं हो जाता, लेबनान में अभियान जारी रहेगा. इन दो विपरीत मांगों के बीच यूएस-ईरान संबंध पर दबाव बढ़ता जा रहा है.
ट्रंप प्रशासन की मुख्य चिंता यह है कि लगातार बढ़ती लड़ाई ईरान के साथ बातचीत को पटरी से उतार सकती है. साथ ही, फ्यूल क्राइसेस का खतरा भी मंडरा रहा है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर, जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति पर निर्भर है. यदि इस जलडमरूमध्य पर संकट गहराया, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं.
दोनों नेताओं के बीच मतभेद की जड़ें सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि घरेलू राजनीतिक भी हैं. ट्रंप आगामी चुनावों से पहले अमेरिका को किसी लंबे मध्य पूर्व युद्ध में नहीं उलझाना चाहते. उनके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं, बढ़ती ईंधन कीमतें और युद्ध से थके मतदाताओं का गुस्सा. उनकी प्राथमिकता है, बाजारों को स्थिर रखना और ईरान के साथ जल्द से जल्द कोई कूटनीतिक हल निकालना.
नेतन्याहू की स्थिति बिल्कुल अलग है. 7 अक्टूबर के हमलों के बाद इजराइली जनता दुश्मनों के खिलाफ ठोस सैन्य कार्रवाई चाहती है. वर्षों की लड़ाई के बावजूद हिजबुल्लाह और ईरान की सरकारी संरचनाएं बरकरार हैं, जिससे इजराइल में घरेलू निराशा और बढ़ी है. नेतन्याहू पर दोहरा दबाव है, एक तरफ अपने देशवासियों को सैन्य सफलता दिखानी है, दूसरी तरफ वॉशिंगटन के साथ संबंध बनाए रखने हैं.