नई दिल्ली: शुक्रवार रात मियामी के इन्वेस्टमेंट फोरम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय नाटो सहयोगियों के रवैये पर खुलकर अपनी खफगी व्यक्त की. ईरान युद्ध अब अपने चौथे सप्ताह में पहुंच गया है, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए सहयोगी देशों ने अपनी सेनाएं भेजने से साफ मना कर दिया. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका हमेशा उनके लिए खड़ा रहा, पर अब उनके इस व्यवहार को देखते हुए जरूरी नहीं कि हम भी उनके साथ खड़े हों. इस बयान ने वैश्विक सुरक्षा गठबंधनों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
होर्मुज जलडमरूमध्य खाड़ी देशों के तेल और गैस निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. ईरानी हमलों के कारण यहां जहाजों की आवाजाही लगभग बंद हो गई है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा और ईंधन की कीमतों में तेज उछाल आया है. ट्रंप ने सहयोगी देशों से अपील की थी कि वे इस रास्ते को सुरक्षित बनाने में मदद करें, लेकिन यूरोपीय देशों ने इसे ठुकरा दिया. राष्ट्रपति ने इसे अमेरिका के एकतरफा फैसले का बहाना बताते हुए निराशा जाहिर की.
मंच से ट्रंप ने साफ कहा कि हम हमेशा उनके लिए मौजूद रहे, लेकिन अब उनके कदमों को देखते हुए लगता है कि हमें ऐसा करने की जरूरत नहीं है. उन्होंने नाटो पर अमेरिका द्वारा किए जाने वाले भारी खर्च का हवाला देते हुए पूछा- अगर वे हमारे लिए नहीं हैं तो हम उनके लिए क्यों रहें. ट्रंप ने इसे ब्रेकिंग न्यूज बताते हुए कहा कि यही सच्चाई है और वे लंबे समय से यह बात कहते आ रहे हैं.
ट्रंप के नाटो के साथ रिश्ते शुरू से ही उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. अनुच्छेद 5 के तहत एक सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है, लेकिन राष्ट्रपति ने कई बार इसकी मंशा पर सवाल उठाए हैं. ईरान अभियान शुरू होने से पहले अमेरिका ने सहयोगियों से सलाह नहीं ली, जिसका यूरोपीय नेताओं ने विरोध किया. अब ट्रंप कह रहे हैं कि अगर वे हमारे साथ नहीं खड़े हुए तो हमें भी सोचना पड़ेगा.
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान समेत प्रमुख देशों ने कहा है कि वे उचित प्रयासों में योगदान देने को तैयार हैं, लेकिन अभी कोई ठोस सैन्य या कूटनीतिक प्रतिबद्धता नहीं दी है. यूरोपीय नेताओं का तर्क है कि अमेरिका ने ईरान पर हमले का फैसला अकेले लिया था. ट्रंप ने इसे कायरता बताते हुए नाटो को कागजी शेर कहा और सोशल मीडिया पर लिखा कि अमेरिका को नाटो से कुछ नहीं चाहिए.
राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ संदेश दिया कि नाटो देशों ने ईरान से निपटने में कोई मदद नहीं की. अब सवाल यह है कि भविष्य में कोई बड़ा संकट आने पर नाटो अमेरिका से मदद मांगेगा तो वाशिंगटन का रुख क्या होगा. यह बयान नाटो की एकजुटता को नई चुनौती दे रहा है और वैश्विक स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था पर असर डाल सकता है.