नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक नई यूरोपीय रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति की दिशा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. रिपोर्ट के अनुसार, रूस और चीन ईरान को इस तरह समर्थन दे रहे हैं कि वे सीधे अमेरिका से टकराव से बचते हुए भी अपने हित साध सकें. यह समर्थन केवल दोस्ती या विचारधारा पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं, जो आने वाले समय में दुनिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, रूस और चीन ईरान को खुलकर समर्थन देने के बजाय संतुलित रणनीति अपना रहे हैं. वे इस बात का ध्यान रख रहे हैं कि अमेरिका के साथ सीधा टकराव न हो, लेकिन ईरान को इतना सहारा मिले कि वह क्षेत्र में सक्रिय बना रहे. इस तरह दोनों देश बिना सीधे जोखिम उठाए अपने प्रभाव को मजबूत कर रहे हैं.
रूस इस समय यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से जूझ रहा है. ऐसे में ईरान उसके लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरा है. रूस ईरान के साथ सैन्य सहयोग और रणनीतिक साझेदारी के जरिए अमेरिका के दबाव को संतुलित करना चाहता है और अपनी वैश्विक स्थिति बनाए रखना चाहता है.
चीन के लिए ईरान केवल एक सहयोगी नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा स्रोत है. खाड़ी क्षेत्र में अपने निवेश और आर्थिक गलियारों को मजबूत करने के लिए चीन ईरान के साथ संबंध बनाए हुए है. इससे उसे तेल आपूर्ति सुरक्षित रखने और क्षेत्र में अपनी आर्थिक पकड़ बढ़ाने में मदद मिल रही है.
विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं है. रूस और चीन मिलकर ऐसे देशों का समूह तैयार कर रहे हैं, जो अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों से स्वतंत्र होकर अपनी नीतियां तय करना चाहते हैं. इससे भविष्य में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यह रणनीति जोखिम से खाली नहीं है. अगर चीन ईरान के बहुत करीब दिखता है, तो खाड़ी के देश अमेरिका की ओर झुक सकते हैं. वहीं, रूस को अपने सीमित सैन्य संसाधनों का संतुलन बनाए रखना होगा. लंबे समय तक संघर्ष जारी रहा तो सभी पक्षों को आर्थिक और रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है.