नई दिल्ली: ईरान की बढ़ती मिसाइल क्षमता को लेकर दुनिया भर में नई बहस छिड़ गई है. हाल के महीनों में ईरान ने दावा किया है कि उसकी हाइपरसोनिक मिसाइलें पहले की तुलना में अधिक तेज, सटीक और आधुनिक हैं. अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों का कहना है कि इन मिसाइलों को रोकना अब पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो गया है.
हालांकि रूस और चीन की ओर से ईरान को सैन्य तकनीकी सहायता मिलने के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसके बावजूद पश्चिमी देशों में इस विषय को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. ईरान ने फतह 1 और फतह 2 जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलों को अपनी रक्षा क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है.
ईरान का दावा है कि ये मिसाइलें ध्वनि की गति से कई गुना तेज उड़ान भर सकती हैं और उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं. इसी वजह से पारंपरिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों के लिए इन्हें रोकना अधिक चुनौतीपूर्ण माना जाता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी हथियार की वास्तविक क्षमता का आकलन स्वतंत्र परीक्षण और युद्ध की परिस्थितियों के आधार पर ही किया जा सकता है.
अमेरिकी अधिकारियों और कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि रूस ईरान के साथ उपग्रह आधारित सूचनाएं और खुफिया जानकारी साझा कर सकता है. इससे मिसाइलों और ड्रोन की लक्ष्य भेदने की क्षमता बेहतर हो सकती है. वहीं कुछ विश्लेषकों ने चीन के संभावित तकनीकी सहयोग की भी चर्चा की है. हालांकि इन दावों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और चीन तथा रूस ने ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया है.
ईरान का मिसाइल कार्यक्रम कई दशकों पुराना है. समय के साथ उसने कम दूरी से लेकर मध्यम दूरी तक की कई मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं. ईरान का कहना है कि उसका मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह आत्मरक्षा के लिए है. दूसरी ओर अमेरिका, इजरायल और कई पश्चिमी देश इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि हाइपरसोनिक हथियारों के बढ़ते विकास से दुनिया में नई हथियार प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है. अमेरिका और इजरायल अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों को लगातार आधुनिक बना रहे हैं. लेकिन हाइपरसोनिक हथियारों से निपटने के लिए नई पीढ़ी की तकनीक, उन्नत रडार और बेहतर इंटरसेप्टर की आवश्यकता महसूस की जा रही है.
मध्य पूर्व में पहले से जारी तनाव के बीच यह तकनीकी प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए नई चुनौती बनती जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य तैयारी के साथ कूटनीतिक प्रयास भी जरूरी हैं ताकि किसी बड़े संघर्ष की संभावना को कम किया जा सके और क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे.