दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक के समर्थन में अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवाज उठने लगी है. अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में दो नागरिक संगठनों ने प्रदर्शन कर भारत सरकार से आंदोलनकारियों के साथ बातचीत शुरू करने और कथित NEET परीक्षा पेपर लीक मामले में प्रभावी कार्रवाई की मांग की. इस प्रदर्शन के बाद वांगचुक का आंदोलन वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है.
शुक्रवार को अमेरिकी संगठन 'हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स' और 'द आज़ादी प्रोजेक्ट' के कार्यकर्ता भारतीय दूतावास के निकट महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने एकत्र हुए. प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां लेकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की मांग दोहराई. प्रदर्शन के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी उठाई गई.
प्रदर्शन से पहले 'हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स' ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र भेजा. पत्र में सरकार से अपील की गई कि वह आंदोलनकारियों के साथ तत्काल संवाद शुरू करे और परीक्षा प्रणाली में सामने आई कथित खामियों पर स्पष्ट जवाब दे. संगठन ने यह भी कहा कि जवाबदेही तय करने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए, ताकि शिक्षा व्यवस्था में लोगों का भरोसा मजबूत हो सके.
संगठन की कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ ने कहा कि सरकार को अब और इंतजार नहीं करना चाहिए तथा आंदोलनकारियों की मांगों पर गंभीरता से विचार करते हुए बातचीत शुरू करनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी स्थिति में किसी प्रदर्शनकारी की जान जोखिम में नहीं पड़नी चाहिए. साथ ही संगठन ने सोनम वांगचुक और भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों से स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की अपील करते हुए कहा कि उनकी आवाज भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है.
सोनम वांगचुक 28 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे थे. उनका आंदोलन कथित NEET परीक्षा पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जिम्मेदारी तय करने की मांगों को लेकर शुरू हुआ. लगातार बिगड़ती तबीयत के कारण शनिवार को दिल्ली पुलिस उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले गई, जहां उनका चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया.
वॉशिंगटन डीसी में हुए प्रदर्शन के बाद यह आंदोलन भारत की सीमाओं से बाहर भी चर्चा का विषय बन गया है. विदेशी नागरिक संगठनों की ओर से समर्थन मिलने से इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली है. हालांकि, इस मामले में सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार आंदोलनकारियों की मांगों पर किस तरह का रुख अपनाती है और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर क्या कदम उठाए जाते हैं.