पाकिस्तान में बहने वाली सिंधु नदी अब पड़ोसी मुल्क के लिए न केवल पानी का प्रमुख स्रोत है, बल्कि इसके तल पर मौजूद सोना उनके लिए उम्मीद की किरण भी है. तिब्बत से चल कर भारत से होते हुए पाकिस्तान पहुंचने वाली इस नदी के तल में भारी मात्रा में सोना मौजूद होने का दावा किया जा रहा है.
मिल रही जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में सिंधु नदी से सोना निकालने का काम तेजी से चल रहा है. इसके लिए अभी तक 77 लीज जारी हो चुके हैं. जिनमें से पांच लीज विदेशी कंपनियों को दिए गए हैं. इतना ही नहीं कुछ लोग अवैध तरीके से भी सोना निकालने की कोशिश कर रहे हैं.
सिंधु नदी में लगातार चल रहे खनन की वजह से कुछ लोगों को आर्थिक फायदा तो हो रहा है, लेकिन दूसरी ओर नदी के किनारों पर कटाव की वजह से किसानों और उनकी जमीन पर असर पड़ रहा है. गिलगित-बाल्टिस्तान में सोना निकालने के लिए भारी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है. जिसकी वजह से कई जगहों पर कटाव इतना बढ़ गया है कि आसपास के खेत धीरे-धीरे नदी में समा रहे हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन गई है. उनका कहना है कि सोने की तलाश में होने वाली गतिविधियों का खामियाजा खेती और पर्यावरण को भुगतना पड़ रहा है.
पाकिस्तान सरकार ने पिछले साल पंजाब प्रांत के अटक जिले के पास सिंधु नदी में सोने के बड़े भंडार मिलने का दावा किया था. बताया गया कि यहां करीब 32 किलोमीटर के क्षेत्र में सोने के कण मौजूद हैं. अनुमान के मुताबिक, इस इलाके में करीब 32.6 मीट्रिक टन तक सोना हो सकता है. इसकी संभावित कीमत करीब 600 अरब पाकिस्तानी रुपए आंकी गई है. सिंधु नदी में मौजूद सोना किसी एक स्थान से अचानक नहीं आया.
वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार, हिमालय और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में लाखों वर्षों से जारी भूगर्भीय गतिविधियों और चट्टानों के कटाव के कारण सोने के छोटे कण नदियों तक पहुंचे.तेज बहाव के साथ ये कण सिंधु नदी में आगे बढ़ते रहे और धीरे-धीरे नदी की तलहटी में जमा होते गए. इस तरह बने भंडार को 'प्लेसर गोल्ड डिपॉजिट्स' कहा जाता है.
पानी कम होने पर इन कणों को निकालना आसान होता है, जबकि पानी अधिक होने पर भारी मशीनों का सहारा लेना पड़ता है. सिंधु दुनिया की प्राचीन और महत्वपूर्ण नदियों में गिनी जाती है. इसी नदी के किनारे सिंधु घाटी सभ्यता का विकास हुआ था, जो लगभग 3300 से 1300 ईसा पूर्व के बीच अपने समृद्ध दौर में रही. 1947 के विभाजन के बाद सिंधु नदी भारत और पाकिस्तान दोनों से होकर बहती है. ऐसे में इस नदी का आर्थिक महत्व ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी बेहद गहरा है.