नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आज FTA यानी फ्री ट्रेड डील फाइनल होने जा रही है. हालांकि दुनिया को अपने टैरिफ नीति से परेशान कर चुके अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह डील पसंद नहीं आ रहा है. या फिर यह भी कहना गलत नहीं होगा कि अपने द्वारा लगाए गए टैरिफ के प्रभाव को कम होता देख राष्ट्रपति ट्रंप अपना आपा खोते जा रहे हैं. उन्होंने इस डील को लेकर चेतावनी दी है.
डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा कि यूरोप भारत के साथ इस डील को साइन करके अपने ही खिलाफ जंग को फाइनेंस कर रहा है. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोप ने भले ही मॉस्को के साथ सीधे एनर्जी संबंध काफी हद तक खत्म कर दिए हों, लेकिन वह भारत के साथ जिस समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहा है, वह अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को फंड करने जैसा है.
अमेरिकी अधिकारी द्वारा यह बयान तब सामने आए हैं जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच डील लगभग तय हो चुका है और आज यानी मंगलवार को इसकी औपचारिक घोषणा करने की तैयारी है. अमेरिका का तर्क है कि रूस से कच्चा तेल भारत पहुंचता है, जहां उसको रिफाइन किया जाता है और फिर वही उत्पाद यूरोपीय बाजारों में बिकते हैं. इस पूरी प्रक्रिया से रूस को अप्रत्यक्ष रूप से रेवेन्यू मिलता है, जो युद्ध को लंबा खींचने में मदद करता है.
बेसेंट ने इस स्थिति को अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच असंतुलन के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन ने मॉस्को की ऊर्जा अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं, जबकि यूरोप वैश्विक तेल व्यापार में आई खामियों से आर्थिक फायदा उठा रहा है. ट्रंप प्रशासन ने भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए हैं, जिनमें से 25 प्रतिशत विशेष रूप से रूसी तेल की खरीद को लेकर हैं.
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी ने यह भी दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. उनके अनुसार अमेरिका ने इस संघर्ष को खत्म कराने के लिए यूरोप की तुलना में कहीं ज्यादा आर्थिक और रणनीतिक बलिदान दिए हैं. एबीसी न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में बेसेंट ने कहा कि भारत पर टैरिफ लगाने के बावजूद, यूरोप ने नई दिल्ली के साथ बड़े व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर लिए, जो अमेरिका के प्रयासों के विपरीत है. हालांकि भारत और यूरोप ने अपने इस समझौते का उद्देश्य अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारत और यूरोप के आर्थिक संबंधों को मजबूत करना बताया है. इस एफटीए पर बातचीत की शुरुआत 2007 में हुई थी, जिसे अब फाइनल किया जा रहा है.