ईरान पर हमले से दो महीने पहले ही चीन ने अपने कदम तेज कर दिए थे. उसने तेल भंडारण की गति अचानक बढ़ा दी. यह बदलाव सामान्य नहीं माना जा रहा. विशेषज्ञ इसे एक सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं. अब सवाल उठ रहा है कि क्या चीन को पहले से हालात का अंदेशा था कि अमेरिका ईरान के बीच जंग शुरू होने वाली. यही वजह है कि यह मामला चर्चा में है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन ने 2026 की शुरुआत में भारी मात्रा में तेल खरीदा. जनवरी और फरवरी में आयात में 15.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई. यह पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है. इस तेजी ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा. यह सिर्फ सामान्य व्यापार नहीं, बल्कि तैयारी का संकेत माना जा रहा है.
एनर्जी विश्लेषकों के अनुसार चीन में लंबे समय से तेल जमा किया जा रहा था. चीनी रेगुलेटर पहले से ही संभावित संकट के लिए तैयार थे. ट्रंप प्रशासन की नीतियों को देखते हुए यह कदम उठाया गया. इसका मतलब है कि चीन ने जोखिम को पहले ही भांप लिया था. यह तैयारी अब सामने आ रही है.
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार चीन के पास करीब 1.4 अरब बैरल तेल का भंडार है. यह दुनिया में सबसे बड़े भंडारों में से एक है. इसके मुकाबले कई विकसित देशों के पास कम स्टॉक है. यह चीन की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत बनाता है. संकट के समय यह बड़ा सहारा साबित हो सकता है.
दूसरी ओर अमेरिका अपने भंडार से तेल निकाल रहा है. हाल ही में उसने लाखों बैरल तेल बाजार में जारी किया है. ट्रंप प्रशासन ने स्ट्रेटेजिक रिजर्व से तेल निकालने की मंजूरी दी है. इसका मकसद कीमतों और सप्लाई को संतुलित रखना है. यह दिखाता है कि अमेरिका दबाव में है.
विशेषज्ञों के मुताबिक चीन के इस कदम के पीछे तीन कारण हैं. पहला, कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं. दूसरा, सप्लाई चेन में रुकावट का खतरा बढ़ रहा था. तीसरा, देश के अंदर नए ऊर्जा नियम लागू किए गए. इन सभी कारणों ने तेल भंडारण को बढ़ावा दिया. यह एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन को पहले से युद्ध का अंदेशा था. घटनाक्रम को देखकर यह संभावना मजबूत होती दिख रही है. चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है. ऐसे में उसने जोखिम को भांपते हुए पहले ही तैयारी कर ली. यही कारण है कि संकट के बावजूद वहां घबराहट नहीं दिख रही.