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उर्दू की दुनिया को छोड़कर चले गए 'मां' के शायर मुनव्वर राणा, जिनकी शायरी ने छुआ था आम लोगों का दिल

Munawwar Rana dies: मुनव्वर राणा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. उनके प्रशंसक उन्हें याद कर रहे हैं.

Antriksh Singh
Edited By: Antriksh Singh
उर्दू की दुनिया को छोड़कर चले गए 'मां' के शायर मुनव्वर राणा, जिनकी शायरी ने छुआ था आम लोगों का दिल

हाइलाइट्स

  • मशहूर शायर मुनव्वर राणा का निधन
  • विवादों से अनजान नहीं थे मुनव्वर राणा

Munawwar Rana dies: मशहूर शायर मुनव्वर राणा का रविवार को देर रात निधन हो गया. वे लखनऊ के एसजीपीजीआई अस्पताल में भर्ती थे. उनकी उम्र 71 वर्ष थी.

मुनव्वर राणा की तबीयत पिछले कई दिनों से खराब थी. मुनव्वर राणा के निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है. उनके प्रशंसक उन्हें याद कर रहे हैं.

आमजनों के दिल में उतरी कविताएं

मुनव्वर राणा का जन्म 26 नवंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुआ था. उन्होंने कई खूबसूरत कविताएँ लिखीं, जिनमें से कई मशहूर हुईं. उनकी कविताएं आम लोगों से जुड़ी हुई थीं.

उन्हें उर्दू साहित्य और गज़लों के लिए जाना जाता था. उनकी शायरी की सबसे खास बात ये थी कि हर कोई उसे आसानी से समझ सकता था. वे अक्सर अपनी गजलों में हिंदी और अवधी के शब्दों का इस्तेमाल करते थे, जिससे भारतीय जनता उन्हें दिल से लगा लेती थी.

उनकी सबसे मशहूर कविता "मां" थी, जो एक मां की महानता को पारंपरिक गज़ल के अंदाज में बयां करती थी.

अवॉर्ड और उनका लौटाना

अपने पूरे करियर में राणा को कई सम्मान मिले, जिनमें 2014 में उनकी कविता की किताब "शहदबा" के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल था. हालांकि, देश में बढ़ती असहिष्णुता से चिंतित होकर उन्होंने लगभग एक साल बाद यह पुरस्कार वापस कर दिया था.

उन्हें अमीर खुसरो अवार्ड, मीर तक़ी मीर अवार्ड, ग़ालिब अवार्ड, डॉ. जाकिर हुसैन अवार्ड और सरस्वती समाज अवार्ड भी मिले. उनके कामों का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है.

राणा ने अपना अधिकांश जीवन कोलकाता में बिताया और भारत और विदेश दोनों में मुशायरों (काव्य सम्मेलनों) में उनकी एक खास पहचान थी.

राणा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रमों में भी सक्रिय थे. उनकी बेटी सुमैया समाजवादी पार्टी (सपा) की सदस्य हैं, जिसका नेतृत्व अखिलेश यादव करते हैं.

मुनव्वर राणा की विरासत

मुनव्वर राणा की विरासत केवल उनकी कविताओं तक ही सीमित नहीं है. उन्होंने अपने जीवन में जो भी सही समझा, उसके लिए लड़ने का साहस दिखाया. चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी कीमत का सामना करना पड़ा.

विवादों से भी नाता रहा

राणा अपने बयानों के लिए अक्सर विवादों में घिरे रहे. उन्होंने तालिबान का समर्थन करने और उसकी तुलना महर्षि वाल्मीकि से करने के साथ-साथ 2020 में पेरिस में पैगंबर मुहम्मद पर विवाद के चलते मारे गए सैमुअल पैटी की हत्या का समर्थन करने के लिए भी कई आलोचनाओं का सामना किया था.

योगी-मोदी के लिए कही थी ये बात

उन्होंने साल 2022 में यूपी में विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के फिर से सत्ता में आने पर प्रदेश छोड़ने की बात कही थी. उनका कहना था कि उनके पिता पाकिस्तान नहीं जा सके लेकिन वे अपना प्रदेश, अपनी मिट्टी छोड़ देंगे. 

उनके कवि दिल का एक उदाहरण पीएम नरेंद्र मोदी की मां के निधन के समय मिलता है. तब उन्होंने कहा था कि किसी की मां के निधन की खबर सुनकर ऐसा लगता है जैसे मेरी मां चली गई है. जब से पीएम की मां की खबर सुनी है तब से मेरे पास शब्द नहीं हैं. अब तो मोदी जी को और संभलकर चलना होगा क्योंकि उनके पास मां की दुआएं नहीं होंगी जो उनको बचा ले जाती थी.