सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा है कि बेल नियम है और जेल अपवाद है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भले ही यह मामला अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट 1967 से ही क्यों न जुड़ा हो. जस्टिस अभय ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक ऐसे शख्स को जमानत दे दी, जिसने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के एक सदस्य को कथित तौर पर अपना घर किराए पर दिया था. आरोप हैं कि इसी घर में PFI का एक ट्रेनिंग सेशन भी हुआ था.
द लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ओका ने फैसला सुनाते हुए कहा, 'जहां भी जमानत देने की बात हो, कोर्ट को जमानत देने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. ऐसा हो सकता है कि अभियोजन पक्ष के आरोप बेहद गंभीर हों लेकिन यह कोर्ट का कर्तव्य है कि कानून के हिसाब से जमानत देना चाहिए. अब हम कह चुके हैं कि बेल नियम है और जेल अपवाद है, यह विशेष कानूनों को लेकर भी लागू होता है. अगर कोर्ट उन मामलों में भी जमानत देने से करताएगा जिनमें बेल दिया जा सकता है, तब यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जाएगा.'
कोर्ट ने जलालुद्दीन खान नाम के एक शख्स को जमानत दे दी. इस शख्स ने पटना हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दलील दायर की थी. जलालुद्दीन खान पर आरोप थे कि वह प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी के काफिले में बवाल करना चाहता था. पीएम मोदी बिहार आ रहे थे. वह गैरकानूनी गतिविधियों में संलिप्त था और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे प्रतिबंधित संगठन से जुड़ा था.
कौन-कौन से लगे हैं ये आरोप?
जलालुद्दीन खान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और UAPA की धारा 120, 120B, 121,121A, 153A, 153B और 34 के तहत केस दर्ज है. खान के खिलाफ दर्ज केस में दावा किया गया है कि पुलिस ने जब रेड किया तो इसके लिंक पीएफआई से मिले. उसने अपने घर का पहला मंजिल, प्रतबंधित संगठन के सदस्यों को किराए पर दिया था.
PFI के सदस्यों की 6 और 7 जुलाई 2022 में यहीं ट्रेनिंग होनी थी. जलालुद्दीन को इन हरकतों के बारे में जानकारी थी, फिर भी उसने घर रेंट पर दिया था. इसके जरिए सीमाई इलाकों में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और PFI के सदस्यों को जोड़ना था.
याचिकार्ता ने दावा किया था कि वह ऐसे किसी संस्था से नहीं जुड़ा है. वह किसी प्रतिबंधित संगठन से नहीं जुड़ा है. उसका रोल सिर्फ संपत्ति को किराए देने तक सिमटी थी. स्पेशल NIA कोर्ट ने पहले इसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट ने पुलिस के दस्तावेजों को पढ़ने के बाद एनआईए कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था.
हाई कोर्ट ने आशंका जाहिर की थी कि ये बाहर निकले तो कहीं फिर से ऐसी वारदातों को अंजाम न दें. कोर्ट को यह भी शक था कि ये साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकते हैं, इसलिए इनकी जमानत याचिका खारिज की. इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. कोर्ट ने जमानत दे दी.