उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बने पुराने मकानों की खूबसूरती आज भी लोगों का ध्यान खींचती है. पत्थर की दीवारें, लकड़ी की नक्काशी और सबसे खास उनकी स्लेट की ढलानदार छतें इन घरों को अलग पहचान देती हैं. ये छतें केवल देखने में खूबसूरत नहीं होती थीं, बल्कि पहाड़ों के मौसम, बारिश, बर्फबारी और तेज हवाओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाती थीं. यानी पुराने समय की पहाड़ी वास्तुकला में खूबसूरती के साथ साथ स्थानीय परिस्थितियों का भी पूरा ध्यान रखा जाता था.
स्थानीय भाषा में स्लेट को पत्थर की पट्टियों के रूप में जाना जाता है. पहाड़ी क्षेत्रों में घर बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पत्थर, लकड़ी और मिट्टी जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है. इनमें स्लेट का इस्तेमाल खासतौर पर छत बनाने के लिए किया जाता था. दूर से देखने पर छत पर एक के ऊपर एक कतार में लगी स्लेट की पट्टियां पूरे मकान को पारंपरिक पहाड़ी रूप देती थीं.
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कई जगहों पर बारिश का मौसम लंबा रहता है और तेज बारिश भी होती है. ऐसे में मकानों की छत का डिजाइन बेहद महत्वपूर्ण होता था. पुराने कारीगर छत में पर्याप्त ढलान रखते थे, ताकि बारिश का पानी उस पर जमा न हो. स्लेट की पट्टियां ढलान के साथ लगाई जाती थीं. बारिश का पानी पत्थरों पर रुकने के बजाय आसानी से नीचे की ओर बह जाता था. इससे छत पर पानी जमा होने की समस्या कम होती थी और मकान के अंदर नमी पहुंचने का खतरा भी घट सकता था. सही तरीके से लगाई गई अच्छी गुणवत्ता की स्लेट लंबे समय तक बारिश का सामना कर सकती थी.
उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दियों के दौरान बर्फबारी आम बात है. ऐसे क्षेत्रों में छत की बनावट केवल बारिश के लिए नहीं, बल्कि बर्फ के भार को ध्यान में रखकर भी तैयार की जाती थी. ढलानदार स्लेट की छत पर जमा बर्फ लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने के बजाय धीरे धीरे नीचे खिसक सकती थी. इससे छत पर अतिरिक्त भार कम करने में मदद मिलती थी. हालांकि अलग अलग क्षेत्रों में बर्फबारी की मात्रा और मौसम के हिसाब से छत की ढलान और ढांचे की मजबूती अलग रखी जाती थी. पुराने समय के कारीगर स्थानीय मौसम और जमीन की परिस्थितियों को अच्छी तरह समझते थे. इसी अनुभव के आधार पर वे मकानों की छत और पूरे ढांचे को तैयार करते थे.
पहाड़ी इलाकों में कई स्थानों पर तेज हवाएं भी चलती हैं. इसलिए छत के लिए ऐसी सामग्री की जरूरत होती थी जो मौसम का लंबे समय तक सामना कर सके. स्लेट की पट्टियां अपेक्षाकृत भारी और मजबूत होती हैं. इन्हें लकड़ी या दूसरे मजबूत ढांचे पर व्यवस्थित तरीके से लगाया जाता था. अगर छत का निर्माण सही तरीके से किया गया हो, तो भारी स्लेट की वजह से तेज हवा में इनके उड़ने की संभावना हल्की छतों की तुलना में कम हो सकती थी. स्लेट लगाने का काम अनुभवी कारीगरों द्वारा किया जाता था, क्योंकि पट्टियों को सही ढलान और क्रम में लगाना जरूरी होता था.
पारंपरिक पहाड़ी मकानों में पत्थर का इस्तेमाल सिर्फ मजबूती के लिए नहीं होता था. पत्थर की एक खासियत यह भी है कि वह गर्मी को धीरे धीरे ग्रहण और छोड़ता है. इसी कारण पत्थर से बने घरों के अंदर का तापमान बाहरी वातावरण की तुलना में कुछ हद तक संतुलित रह सकता था. पहाड़ों में जहां दिन और रात के तापमान में काफी अंतर हो सकता है, वहां पारंपरिक निर्माण शैली का यह गुण उपयोगी माना जाता था. स्लेट और पत्थर से बनी संरचना गर्मियों में घर को अपेक्षाकृत ठंडा और सर्दियों में बाहरी तापमान के मुकाबले कुछ संतुलित रखने में मदद कर सकती थी.