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1991 के बाद कांग्रेस सिर्फ एक बार ही जीत सकी 200 सीटें, आज सबसे खराब दौर से गुजर रही है पार्टी

Lok Sabha Elections 2024: देश में पहले आम चुनाव 1951-52 में और चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की जीत हुई. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार पहले लोकसभा चुनाव में लोकप्रियता के शिखर पर सवार कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं. पार्टी को कुल 44.99 प्रतिशत वोट मिले थे.

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Pankaj Soni

Lok Sabha Elections 2024 : देश में पहले आम चुनाव 1951-52 में और चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस की जीत हुई. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार पहले लोकसभा चुनाव में लोकप्रियता के शिखर पर सवार कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं. पार्टी को कुल 44.99 प्रतिशत वोट मिले थे.

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सभी राजनीतिक दल तैयारी में जुटे हुए हैं. वहीं देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में भगदड़ मची हुई है. पार्टी के महापौर से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तक कांग्रेस साथ छोड़कर दूसरे दलों में शामिल हो रहे हैं. आज कांग्रेस जिनती कमजोर दिख रही है इसके पहले कभी ऐसी नहीं दिखी. 1991 के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होनी शुरू 2004 और 2014 में गठबंधन के सहारे सत्ता में रही और 2014 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. 1991 के बाद केवल 2009 के लोकसभा चुनाव में ही यह पार्टी 200 सीटों का आंकड़ा छू पाई. 2024 के चुनाव में कांग्रेस का होगा यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा.  

पहेल आम चुनाव में कैसी थी कांग्रेस की स्थिति?

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि 1951-52 के आम चुनाव में लोकप्रियता के शिखर पर सवार कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं थीं. पार्टी को 44.99 प्रतिशत वोट मिले थे. इसके बाद तीसरी लोकसभा के लिए 1962 में चुनाव हुए तो कांग्रेस का वोट प्रतिशत और सीटें दोनों घट गए. कांग्रेस का वोट 44.71 प्रतिशत रह गया, जबकि सीटें 361 पर आ गईं. इसके बाद 1967 में पार्टी की लोकप्रियता और कम हो गई और वोट घटकर 40.78 प्रतिशत हो गया तो सीटें 283 रह गईं. हालांकि कांग्रेस ने 1971 में फिर से वापसी की. पार्टी का का वोट बढ़कर 43.68 प्रतिशत और सीटें 352 हो गईं. तब पार्टी को मजबूत करने में सबसे ज्यादा योगदान आंध्र प्रदेश की 28, बिहार की 39, महाराष्ट्र की 42 और उत्तर प्रदेश की 73 सीटों का रहा.

आपातकाल के बाद कांग्रेस की हालत हुई खराब

कांग्रेस पार्टी के लिए 1977 बहुत बुरा दौर था. यही साल था जब कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से बेदखल होना पड़ा. देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था. लोकसभा का कार्यकाल नवंबर में खत्म होने वाला था, लेकिन, अचानक 18 जनवरी को चुनाव की घोषणा कर दी गई. आपातकाल से नाराज जनता एकजुट हुई और कांग्रेस को केवल 154 सीटों पर समेट दिया. वोट प्रतिशत भी 34 फीसदी पर आ गया. 26 वर्षों में कांग्रेस के लिए यह सबसे बड़ी चुनावी हार थी. इस चुनाव में जनता पार्टी को 295 सीटें मिलीं और उसने सरकार बना ली।

1980 में कांग्रेस की जोरदार वापसी                

जनता पार्टी की सरकार तो बन गई, लेकिन वह पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए. इस चुनाव में कांग्रेस को 42.69 प्रतिशत वोट के साथ 353 सीटें मिलीं. 1984 में पार्टी इस आंकड़े को भी पार कर गई. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षा गार्डों ने हत्या कर दी. इससे देश में कांग्रेस के प्रति जबरदस्त सहानुभूति की लहर उठी.   
                                   

1984 का रिकॉर्ड आज तक नहीं टूटा

सहानुभूति की लहर में कांग्रेस का वोट बढ़कर 48 प्रतिशत को पार कर गया. इस चुनाव में कांग्रेस को रिकॉर्ड 414 सीटें मिलीं. यह वह रिकॉर्ड है जो न तो कांग्रेस कभी दोहरा पाई और न ही कोई इस रिकार्ड को तोड़ पाया. पिछले 10 वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची भाजपा इसक रिकार्ड से अभी सैकड़ों सीट दूर है. भाजपा को 2014 में 282 सीटें और पिछले चुनाव में 303 सीटें मिलीं. इस बार भाजपा ने 400 के पार का नारा दिया है.

1989 तक अकेले बहुमत नहीं

लोकसभा में बहुमत के लिए  272 सीटों की जरूरत होती है. आंकड़े बताते हैं कि 1984 के बाद कांग्रेस को कभी भी अकेले बहुमत नहीं मिला. 1989 में उसे 39.53 प्रतिशत वोट और 197 सीटें मिलीं. वहीं 1991 में उदारीकरण के दौर में पार्टी को 36.40 फीसदी वोट और 244 सीटें मिलीं. उस समय पहली बार भाजपा को 120 सीटें मिली थीं और उसका वोट 20 प्रतिशत से ज्यादा था. 

जब पार्टी ने लगाई हार की हैट्रिक

कांग्रेस की स्थिति लगातार खराब होती गई, जब तक कि 2004 का चुनाव नहीं हुआ. 1996 में कांग्रेस को 140 और भाजपा को 161 सीटें मिलीं. वहीं 1998 में पार्टी ने 141 तो भाजपा ने 184 सीटें जीतीं. 1999 में भाजपा ने 182 सीटें जीतकर एनडीए सरकार बनाई. कांग्रेस इस बार भी 114 सीटों पर सिमट गई. उसका वोट भी 28.30 फीसदी रह गया.

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