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Katchatheevu Island: 50 साल पुराने कच्चातिवु का कच्चा चिट्ठा, कैसे इंदिरा ने श्रीलंका के सामने रख दी 'थाली'

Katchatheevu Island: कच्चातिवु द्वीप को लेकर श्रीलंका और भारत के बीच कुछ समझौते हुए थे, जिसके बाद इसे भारत सरकार ने श्रीलंका को सौंप दिया था. हालांकि, उस वक्त इंदिरा सरकार के इस फैसले का विरोध किया गया था, जो आज भी जारी है.

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India Daily Live

Katchatheevu Island: 17वीं सदी में मदुरई के राजा रामानंद के राज्य का हिस्सा रहे कच्चातिवु द्वीप पर 21वीं सदी में रार छिड़ गई है. पीएम मोदी का आरोप है कि 1974 में इंदिरा गांधी ने इस द्वीप को श्रीलंका के सामने परोस दिया था, जो कभी भारत के कब्जे में हुआ करता था. पीएम मोदी के आरोपों के बाद कांग्रेस ने भी पलटवार किया. लेकिन सवाल ये कि आखिर इस द्वीप का पुराना इतिहास क्या है? आखिर ये कच्चातिवु द्वीप का मुद्दा अचानक कैसे सामने आया? आखिर क्यों कच्चातिवु द्वीप भारत के कब्जे से श्रीलंका के कब्जे में चला गया?

सबसे पहले ये जान लीजिए कि कच्चातिवु द्वीप का इतिहास क्या है. जिस द्वीप का पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव से पहले जिक्र किया है, वो द्वीप हिंद महासागर के साउथ पोल पर मौजूद है. आसान शब्दों में समझें, तो ये द्वीप भारत के आखिरी छोर यानी रामेश्वरम और श्रीलंका के बीच है. रामेश्वरम के तट से इसकी दूरी करीब 33 किलोमीटर है, जबकि श्रीलंका के जाफना से इसकी दूरी करीब 62 किलोमीटर है.

कच्चातिवु द्वीप पर एकमात्र संरचना 20वीं सदी का कैथोलिक चर्च है, जिसे सेंट एंथोनी चर्च के नाम से जाना जाता है. हर साल होने वाले एक उत्सव के दौरान भारत और श्रीलंका के ईसाई धर्मों के लोग यहां जाते हैं. 2023 में करीब 2500 भारतीय रामेश्वरम से कच्चातिवु द्वीप गए थे. 

285 एकड़ में फैले इस द्वीप को लेकर श्रीलंका और भारत के बीच पहला विवाद 1921 में सामने आया. तब दोनों देशों ने मछली पकड़ने और उसके कारोबार के लिए इस द्वीप पर अपना-अपना दावा ठोका. उस वक्त मामला ठंडा पड़ गया. 1947 में भारत के आजाद होने के करीब 27 साल बाद यानी 1974 में भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को लेकर कुछ समझौते हुए.

जून 1974 में भारत सरकार ने दी ये जानकारी

1974 से 1976 के बीच भारत-श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को लेकर कुल 4 समझौते हुए थे. 26 और 28 जून 1974 को दिल्ली और कोलंबो में दोनों देशों के बीच दो दौर की बैठक हुई थी, जिसमें आम सहमति के बाद भारत ने इस द्वीप को श्रीलंका को सौंप दिया था. जून 1974 में तत्कालीन विदेश सचिव केवल सिंह ने कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका सौंपे जाने की जानकारी दी. विदेश सचिव केवल सिंह ने कहा कि कच्चातिवु पर श्रीलंका का दावा बहुत मजबूत था. श्रीलंका की ओर से कई पुराने रिकार्ड की जानकारी दी गई. श्रीलंका की ओर से मैप भी पेश किया गया, जो डच और ब्रिटिश जमाने का था. इस मैप में कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका के जाफना पट्टनम का हिस्सा दिखाया गया था.

कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इंदिरा गांधी ने कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को सौंपने के दौरान सोचा कि इस द्वीप का कोई रणनीतिक महत्व नहीं है, लिहाजा इस द्वीप से भारत का कब्जा ख़त्म होने से पड़ोसी के साथ संबंध और गहरे हो जायेंगे. उधर, तत्कालीन इंदिरा सरकार की ओर से इस जानकारी के बाद काफी विरोध हुआ. तमिलनाडु के उस वक्त के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने केंद्र सरकार के फैसले का विरोध किया और इस द्वीप को वापस भारत के कब्जे में लाने की मांग की. इंदिरा गांधी की सरकार से पहले पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के दौरान भी इस द्वीप का मुद्दा उठा था, लेकिन उन्होंने मई 1961 में इसे अप्रासंगिक बताकर खारिज कर दिया था. 

katchatheevu island
 

सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था कच्चातिवु द्वीप का मामला

1974 में केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री की मांग पर इंदिरा सरकार ने कोई खास ध्यान नहीं दिया था. धीरे-धीरे समय गुजरता गया और करीब 34 साल बाद यानी 2008 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं. उन्होंने कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को सौंपे जाने के इंदिरा सरकार के फैसले के खिलाफ याचिका दायर करते हुए इस फैसले को अमान्य करार देने की भी मांग की. उन्होंने इंदिरा सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार देने की भी मांग की. 

2011 में मुख्यमंत्री बनने के बाद, उन्होंने राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया और 2012 में, श्रीलंका द्वारा भारतीय मछुआरों की बढ़ती गिरफ्तारियों के मद्देनजर अपनी याचिका में तेजी लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट गईं. पिछले साल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एमके स्टालिन ने श्रीलंका के प्रधान मंत्री रानिल विक्रमसिंघे की भारत यात्रा से पहले पीएम मोदी को एक पत्र लिखा था, जिसमें पीएम से कच्चातिवु के मामले सहित प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करने के लिए कहा था.

कच्चातिवु द्वीप से जुड़ा विवाद आखिर क्या है?

दरअसल, भारत के आखिरी छोर यानी रामेश्वरम के मछुआरे अक्सर मछली पकड़ने के लिए कच्चातिवु द्वीप पहुंच जाते थे. ऐसे में भारतीय मछुआरों को अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करना पड़ता था. ऐसा करते ही श्रीलंका की नेवी भारतीय मछुआरों को कब्जे में ले लेती थी. साल 1974 से 1976 के बीच भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को लेकर जो 4 समझौते हुए थे, उनमें एक ये भी था कि भारतीय मछुआरे अपनी जालों को सुखाने के लिए इस द्वीप पर जा सकेंगे, लेकिन उन्हें इस द्वीप पर मछली पकड़ने की इजाजत नहीं होगी. 

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