नई दिल्ली: देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाने वाला इंदौर आज पानी के संकट की भयावह तस्वीर पेश कर रहा है. भगीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से 15 लोगों की मौत और 1400 से ज्यादा लोगों के बीमार पड़ने की पुष्टि ने प्रशासन और व्यवस्था दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है. एमजीएम मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि मौतों की वजह जहरीला पानी ही था. यह घटना बताती है कि स्वच्छता रैंकिंग और जमीनी हकीकत के बीच अब भी बड़ी खाई है.
भगीरथपुरा क्षेत्र में अचानक बड़ी संख्या में लोग उल्टी, दस्त और बुखार की शिकायत के साथ अस्पताल पहुंचे. जांच में सामने आया कि इलाके में सप्लाई हो रहा पानी गंभीर रूप से दूषित था. समय रहते सप्लाई बंद नहीं की गई और न ही लोगों को चेतावनी दी गई. नतीजा यह हुआ कि 15 जानें चली गईं. यह घटना प्रशासनिक लापरवाही और कमजोर निगरानी का गंभीर उदाहरण बन गई है.
भारत में पेयजल संकट केवल कमी तक सीमित नहीं है. पानी की मात्रा, गुणवत्ता और समान पहुंच तीनों ही बड़ी समस्याएं हैं. कई इलाकों में गर्मियों में जल स्रोत सूख जाते हैं, वहीं कई जगह पानी उपलब्ध होने के बावजूद पीने लायक नहीं होता. भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और यह संकट उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक फैल चुका है.
देश के कई राज्यों में पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट और भारी धातुएं पाई जाती हैं. बैक्टीरिया और वायरस की मौजूदगी हालात को और खतरनाक बनाती है. ऐसे पानी से दस्त, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियां फैलती हैं. लंबे समय तक रसायनिक तत्वों के सेवन से कैंसर, हड्डियों की बीमारी और दिल से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं.
2019 में शुरू हुए जल जीवन मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण घर तक नल से साफ पानी पहुंचाना है. 2019 में जहां केवल 17 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल जल था, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 80 प्रतिशत से अधिक हो गया. यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन कई जगह सप्लाई अनियमित है और गुणवत्ता की जांच कमजोर बनी हुई है.
सुरक्षित पानी केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास का विषय है. पाइपलाइन की नियमित जांच, जल स्रोतों की निगरानी और समय पर चेतावनी व्यवस्था जरूरी है. घरेलू स्तर पर पानी उबालना, फिल्टर का उपयोग और जागरूकता भी अहम है. इंदौर की घटना चेतावनी है कि अगर पानी की गुणवत्ता पर तुरंत और गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहरा सकता है.