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UNSC Permanent Seat: भारत 8 बार रह चुका है सुरक्षा परिषद का सदस्य, फिर भी क्यों चाहता है स्थायी सीट?

भारत 8 बार UNSC का अस्थायी सदस्य रह चुका है.  वैश्विक बदलावों, विशाल आबादी, आर्थिक ताकत और शांति अभियानों में योगदान का हवाला देते हुए भारत अब स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है.

Sagar
Edited By: Sagar Bhardwaj
UNSC Permanent Seat: भारत 8 बार रह चुका है सुरक्षा परिषद का सदस्य, फिर भी क्यों चाहता है स्थायी सीट?
Courtesy: pinterest

द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का गठन किया गया था.  इसके गठन को 80 से अधिक वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसकी स्थायी सदस्यता संरचना में कोई बदलाव नहीं आया है.  इस शक्तिशाली परिषद में चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे 5 देश स्थायी सदस्य (P5) के रूप में काबिज हैं, जिनके पास वीटो पावर है.  भारत लंबे समय से वैश्विक वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था में बदलाव और विस्तार की मांग कर रहा है. 

भारत की उम्मीदवारी और वैश्विक सुधार की मांग

भारत ने आधिकारिक तौर पर पहली बार 1994 में संयुक्त राष्ट्र की 49वीं महासभा के दौरान UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए अपना दावा पेश किया था.  इसके बाद से भारत हर मंच से इस मांग को दोहराता आ रहा है.  सितंबर 2000 में न्यू यॉर्क के 'UN मिलेनियम समिट' के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी भारत का पक्ष मजबूती से रखा था.  भारत का तर्क है कि विकासशील देशों, एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका को सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व मिलना आवश्यक है. 

स्थायी और अस्थायी श्रेणियों में विस्तार का तर्क

नई दिल्ली का मानना है कि सुरक्षा परिषद में केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से इसकी फैसला लेने की प्रक्रिया में सुधार नहीं होगा.  संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में केवल एक बार 1965 में संशोधन करके सदस्यों की संख्या 11 से बढ़ाकर 15 की गई थी, जिसके तहत 4 नई अस्थायी सीटें जोड़ी गई थीं.  भारत का कहना है कि 1945 का वैश्विक संतुलन अब बदल चुका है.  भारत अपनी विशाल आबादी, मजबूत लोकतंत्र, बढ़ती अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक कद के कारण स्थायी सदस्यता का पूरी तरह हकदार है. 

शांति अभियानों में भारत का अतुलनीय योगदान

2028-29 के कार्यकाल के लिए भारत ने अपनी गैर-स्थायी सदस्यता का अभियान भी आधिकारिक रूप से शुरू किया है.  इस दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि भारत ने यूएन के लगभग 50 शांति अभियानों (Peacekeeping Missions) में अब तक करीब 3,00,000 सैनिकों का योगदान दिया है.  वर्तमान में भी भारत के हजारों सैनिक संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शांति अभियानों में तैनात हैं.  भारत हमेशा से ही संवाद, कूटनीति और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की आवाज बुलंद करने में आगे रहा है. 

अस्थायी सदस्य के रूप में भारत का सफर

भारत अब तक 8 बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना जा चुका है.  भारत पहली बार 1950-51 में इसका सदस्य बना था.  इसके बाद 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92, 2011-12 और हाल ही में 2021-22 में भारत ने यह जिम्मेदारी संभाली है.  इन सभी कार्यकालों के दौरान भारत ने अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, प्रतिबंधों और विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.  भारत ने 2028-29 के कार्यकाल के लिए "शांति" (Norms, Trust, Integrity) थीम के तहत अपना चुनाव अभियान शुरू किया है. 

स्थायी और अस्थायी सदस्यता में मुख्य अंतर

सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों के पास एक वोट देने का अधिकार होता है.  लेकिन 5 स्थायी सदस्यों (P5) के पास 'वीटो पावर' होती है.  वीटो पावर का मतलब है कि अगर कोई भी एक स्थायी सदस्य किसी प्रस्ताव के खिलाफ वोट कर दे, तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता, भले ही अन्य सभी देश उसके समर्थन में हों.  अगर भारत को स्थायी सीट मिलती है, तो उसे भी यह वीटो अधिकार मिलेगा, जिससे वैश्विक मामलों और निर्णयों में भारत की सीधी और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी. 

वैश्विक समर्थन और चीन का रुख

भारत के स्थायी सीट के दावे को विश्व स्तर पर व्यापक समर्थन प्राप्त है.  P5 देशों में से चार देश- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस-भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन करते रहे हैं.  हालांकि, चीन ने इस पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है.  इसके अलावा, कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों, ब्रिक्स (BRICS) संगठन के सदस्य देशों और कई अन्य विकासशील देशों ने भी माना है कि सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन में भारत सबसे मजबूत और स्वाभाविक दावेदार है.