प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दो कार्यकाल के दौरान दो न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन को समंदर में उतारकर 'इंडिया फर्स्ट' पॉलिसी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है. पहली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी SSBN INS अरिहंत को लॉन्च होने के 7 साल बाद 2016 में कमीशन किया गया था. वहीं, दूसरी SSBN INS अरिघट को लॉन्च होने के 7 साल बाद 29 अगस्त, 2024 को कमीशन किया गया. अब तीसरी SSBN INS अरिदमन को अगले साल कमीशन किया जाएगा. इस बीच, भारत के पहले बैलिस्टिक मिसाइल ट्रैकर शीप INS ध्रुव को 10 सितंबर, 2021 को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की ओर से कमीशन किया गया था.
SSBN भारत की परमाणु तिकड़ी की घोषित पॉलिसी का हिस्सा है. दो बैलिस्टिक मिसाइल सबमरीन भारत को न्यूक्लियर क्षमताओं के साथ एक प्रमुख ब्लू वाटर नेवी के रूप में पेश करती है. ये न केवल भारत की इंडो-पैसिफिक में पहुंच निषेध क्षमताओं को मजबूत करती हैं, बल्कि उस आशंकित खतरे से भी भारत की भूमि की रक्षा करती हैं.
आज दो एयरक्राफ्ट कैरियर और दो SSBN के साथ भारत विध्वंसक, फ्रिगेट और डीजल अटैक सबमरीन्स के शक्तिशाली बेड़े के साथ हिंद महासागर क्षेत्र पर हावी है. यह पड़ोस में भारतीय विरोधियों के लिए भी एक संदेश है कि किसी भी आक्रमण का जवाब बड़ी ताकत से दिया जाएगा.
मोदी सरकार के नेशनल सिक्योरिटी प्लानर एक बड़े सतही मंच (Surface platform) की अपेक्षा एक भूमिगत निवारक (Underground Deterrent) के पक्ष में हैं. ये इस बात से स्पष्ट है कि नौसेना तीसरे वायु रक्षा पोत (Air Defense Vessel) के निर्माण की अपेक्षा दो न्यूक्लियर एनर्जी से चलने वाली पारंपरिक रूप से सशस्त्र सबमरीन और एडवांस क्षमताओं वाली तीन अतिरिक्त कलवरी कैटेगरी की डीजल हमलावर सबमरीन के निर्माण को प्राथमिकता दे रही है.
अपनी स्वदेशी क्षमताओं का निर्माण करते हुए, सरकार चीनी पीएलए नौसेना पर भी नज़र रख रही है, जिसके पास वर्तमान में कार निकोबार के दक्षिण से श्रीलंका के पूर्व तक तीन वैज्ञानिक सर्वेक्षण पोत हैं, जो भविष्य की सबमरीन संचालन के लिए हाइड्रोग्राफ़िक सर्वेक्षण कर रहे हैं. एक विध्वंसक और दो लैंडिंग जहाजों समेत पीएलए एंटी-पायरेसी टास्क फोर्स ने कोलंबो गहरे समुद्र बंदरगाह पर एक ऑपरेशनल टर्नअराउंड पूरा कर लिया है.
चीन पहले से ही अंतरिक्ष से सबमरीन टेक्नोलॉजी पर नज़र रखने वाले उपग्रहों पर काम कर रहा है, ऐसे में मोदी सरकार ऐतिहासिक और पारंपरिक भूमि आधारित सिद्धांत से हटकर समुद्र आधारित सैन्य सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित करती दिख रही है.