Haryana Assembly Elections 2024: पेरिस ओलंपिक 2024 में चैंपियन होने के बाद भी मेडल से चूकीं विनेश फोगाट, राजनीतिक अखाड़े में कितनी मजबूत हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है. विनेश फोगाट, पेरिस से सब गंवाकर, जब भारत लौटीं तो उनका स्वागत किसी भी दूसरे ओलंपियन की तुलना में कहीं ज्यादा धूम-धड़ाके से हुआ. लोगों की संवेदनाएं उनके साथ थीं, अब यही संवेदनाएं, उनकी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही हैं, जिस पर वे पूरी तरह फिट भी बैठती हैं. 2023 में ऐसे कई मौके आए, जब विनेश फोगाट सड़क पर रहीं. भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के तत्कालीन चेयरमैन बृजभूषण शरण सिंह पर पहलवानों के गंभीर आरोप लगे. बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट, चट्टान की तरह पहलवानों के समर्थन में खड़े रहे. लाठियां पड़ीं, लोगों ने राजनीतिक कहा लेकिन ये दोनों पहलवान हटे नहीं.
विनेश फोगाट को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गीता और बबीता फोगाट की वजह से अपने परिवार का सदस्य बता चुके हैं. अपने परिवार का मतलब, बीजेपी परिवार लेकिन विनेश को शिकायत, इसी सरकार से है, जिसकी कहानी विपक्ष को बाखूबी पता है. पहलवानों की नाराजगी कितनी असरदार थी, यह जानने के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव याद कर लीजिए. किसान और पहलवानों ने बीजेपी की हरियाणा में सीटें घटा दीं. हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा था, घटकर बीजेपी 5 पर आ गई. विधानसभा चुनावों के लिए भी संकेत ठीक नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में विनेश फोगाट का दबदबा और बढ़ सकता है.
हरियाणा विधानसभा चुनाव 5 अक्टूबर को होंगे. सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ एक सत्ता विरोधी लहर है. किसान अब भी शंभू बॉर्डर पर डेरा डालकर बैठे हैं, सरकार की नीतियों से नाराज हैं. अगर बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ बीजेपी की सरकार ने एक्शन लिया होता तो शायद पहलवान मान भी जाते लेकिन पहलवान, बृजभूषण पर एक्शन न लेने की वजह से पहले ही भड़के हैं. ज्यादातर पहलवान, किसानों के ही बच्चे हैं. पहलवानों के धरने में भी किसानों का असर साफ नजर आया था. विनेश फोगाट खुद, जब किसान आंदलोन के 200 दिन, इस बार पूरा हुआ, तो शंभू बॉर्डर चली गईं. रोजगार बड़ा मुद्दा है ही. ऐसे में अगर विनेश फोगाट भी लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं तो सूबे की सियासत बदल सकती है.
विनेश फोगाट ओलंपियन हैं. उन्होंने बृजभूषण के खिलाफ धरना दिया. सरकार की ऐसी छवि बनी कि वह बलात्कारियों को बचाती है. विनेश फोगाट और दूसरी महिला पहलवानों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया था. इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा भी शामिल हुए थे. कांग्रेसी और दूसरे विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना लिया. विनेश फोगाट, 27 अगस्त को जींद में खाप पंचायतों से मिलीं और कहा कि उन पर राजनीति में शामिल होने का दबाव बढ़ रहा है. जैसी उनकी लोकप्रियता है, किसी भी विधानसभा से चुनाव जीतने की वे काबिलियत रखती हैं और पड़ोसी विधानसभाओं में भी उनके क्रेज को भुनाया जा सकता है.
विनेश फोगाट, खुद कह चुकी हैं कि उन पर राजनीति में शामिल होने का दबाव है. वे यह भी कह चुकी हैं कि कोई भी फैसला, बिना बड़ों से सलाह लिए बिना वे नहीं लेंगी, जब उनका दिमाग स्थिर होगा तो वे सोचेंगी कि क्या करना है, अभी वे सदमे में हैं.
विनेश फोगाट, राजनीतिक परिवार से आती हैं. उनकी चचेरी बहन बबीता फोगाट ने बीजेपी के टिकट पर साल 2019 का विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन हार गई थीं. तब तक विनेश फोगाट और बबीता में सब ठीक था. पहलवानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान बबीता फोगाट और उनके पति ने विनेश फोगाट के प्रदर्शन पर सवाल खड़े किए थे, तब से दोनों की नहीं बन रही है.
ओलंपिक के दौरान राज्य के पहलवान विनेश फोगाट के साथ हुए 'छल' को लेकर भड़के थे, वहीं उनकी बहनें, उनके साथ नजर नहीं आईं. बबीता फोगाट ने यहां तक कह दिया कि विरोध प्रदर्शन ही कांग्रेस के इशारे पर खड़ा हुआ है. ऐसे में इस पारिवारिक कलह को भी विपक्ष भुनाने की कोशिश करेगा. हरियाणा में कांग्रेस एक बार फिर इसे मौका मान रही है. लोगों का कहना है कि विनेश का झुकाव, वैसे भी कांग्रेस की तरफ ही है. चर्चा तो ऐसी है कि अगर वे चुनाव लड़ती हैं तो उन्हें दादरी विधानसभा से बबीता फोगाट के खिलाफ उतारा जा सकता है.
विनेश फोगाट के साथ साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया जैसे पहलवान हैं. बजरंग पुनिया तो पहलवान आंदोलन के दौरान अपना पद्मश्री लौटा चुके हैं. हरियाणा विधानसभा में पहलवानों की नाराजगी एक बड़ा मुद्दा है, ठीक उसी तरह, जैसे किसान आंदोलन. लोकसभा चुनावों में भी किसान (मुख्यत: जाट) और पहलवानों की नाराजगी का असर ये हुआ कि कांग्रेस 5 सीटें जीत गई और बीजेपी की इतनी ही सीटें घट गईं. कांग्रेस, ग्रामीण इलाकों में खुद को मजबूत करने में जुट गई है.
विनेश फोगाट, हरियाणा में स्टार बन चुकी हैं. किसानों से लेकर खाप पंचायतों तक में उनका दबदबा है. जाट नेता भी उनके समर्थन में हैं, किसान भी, पहलवान भी और युवा भी. अगर वे सक्रिय राजनीति में उतरती हैं तो कांग्रेस उन्हें अपनी खेमे में लाना जरूर चाहेगी. बीजेपी से उनके तेवर मैच नहीं होते हैं, ऐसे में बीजेपी में जाने का सवाल कम ही पैदा हो रहा है. विनेश फोगाट जींद, रोहतक और शंभू बॉर्डर पर खाप पंचायतों और किसानों से मुलाकात कर चुकी हैं. वे इसी विचारधारा के करीब खुद को पाती हैं. वे दोहरा भी चुकी हैं कि मुश्किल वक्त में किसानों ने उनका साथ दिया था.
पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा, विनेश फोगाट के साथ ही पेरिस से घर लौटे थे. वे तो उन्हें सांसद मनोनीत करना चाहते थे. विनेश फोगाट ने अभी यह नहीं बताया है कि वे किस पार्टी में जा रही हैं लेकिन कई राजनीतिक पार्टियां, उन्हें भुनाना चाहती हैं. वे वैचारिक रूप से कांग्रेस के ज्यादा करीब हैं. अगर वे चुनावी मैदान में उतरती हैं तो सत्ता विरोधी लहर को और हवा मिल सकती है.