नई दिल्ली: असम की राजनीति में एक बार फिर 'मियां' समुदाय को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका प्रशासन इस समुदाय के प्रति सख्त रवैया अपनाना जारी रखेगा. मुख्यमंत्री ने 'मियां' समुदाय को अवैध प्रवासी मानते हुए राज्य छोड़ने के लिए दबाव डालने की वकालत की है. सरमा का यह बयान न केवल राज्य की जनसांख्यिकी बल्कि सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है.
मुख्यमंत्री सरमा ने मीडिया से बात करते हुए साफ किया कि 'मियां' समुदाय के लोग असम में शांति से नहीं रह पाएंगे. उनके अनुसार, इन लोगों को राज्य से बाहर करने के लिए लगातार सख्ती और प्रशासनिक दबाव जरूरी है. उन्होंने कहा कि जब तक उनके लिए मुश्किलें पैदा नहीं की जाएंगी, वे राज्य नहीं छोड़ेंगे. सरमा का मानना है कि अवैध रूप से रहने वाले लोगों को राज्य में काम करने या बसने की अनुमति देना कानूनन गलत है.
असम में 'मियां' शब्द का प्रयोग लंबे समय से बंगाली भाषी मुसलमानों के लिए किया जाता रहा है. ऐतिहासिक रूप से इसे अपमानजनक माना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में कई एक्टिविस्टों ने इसे अपनी पहचान और विरोध के प्रतीक के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है. मुख्यमंत्री सरमा ने इस समुदाय पर सत्रों (धार्मिक केंद्रों) और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया है. वे इस समुदाय को राज्य की मूल संस्कृति के लिए खतरा मानते हैं.
सरमा ने अपने पिछले बयानों का बचाव करते हुए एक विवादित उदाहरण दिया. उन्होंने कहा था कि अगर कोई 'मियां' रिक्शा चालक पांच रुपये मांगता है, तो उसे केवल चार रुपये देने चाहिए. मुख्यमंत्री का तर्क है कि कानून के हिसाब से ये लोग राज्य में काम करने के पात्र नहीं हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि बांग्लादेश से आए लोग असम में रोजगार कैसे पा सकते हैं. यह बयान समुदाय के आर्थिक बहिष्कार की दिशा में एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि अगली जनगणना तक असम में बांग्लादेशी मुसलमानों की आबादी बढ़कर 40 प्रतिशत तक हो सकती है. उन्होंने 'मियां' समुदाय पर 'लव जिहाद' और 'फर्टिलाइजर जिहाद' जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं. उनका दावा है कि राज्य की जनसांख्यिकी में तेजी से हो रहे बदलावों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाना अनिवार्य है. यह बयान राज्य में नागरिकता और पहचान के मुद्दों को फिर से मुख्यधारा में ले आया है.
सरमा के इस रुख ने असम में मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है. आलोचकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से समाज में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है. वहीं, मुख्यमंत्री का कहना है कि वे केवल असम के मूल निवासियों के हितों की रक्षा कर रहे हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर समुदाय उनकी सलाह नहीं मानता, तो सरकार को उनके खिलाफ और अधिक कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.